जो सरकार का नहीं, वो हमारा भी नहीं, सुन्नी बनाम देवबंदी का नारा उछाला

ख्वाजा सैयद हसन हजरत सुल्तानुल आरफीन (बड़े सरकार)।

भारत निर्वाचन आयोग का प्रयास रहता है कि चुनाव जाति, धर्म, समूह, वर्ग और क्षेत्रवाद जैसे मुद्दों पर न लड़ा जाये, लेकिन चुनाव आते ही आयोग की मंशा तार-तार हो जाती है। चुनावी माहौल में राजनीति अपने निम्नतर स्तर पर पहुंच जाती है। समाजवादी पार्टी द्वारा टिकट घोषित करते ही राजनैतिक गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। मुद्दे उछलने लगे हैं, इसी क्रम में सुन्नी बनाम देवबंदी का मुद्दा उछाल दिया गया है, जिससे पार पाना सपा प्रत्याशी के लिए आसान न होगा।

जी हाँ, बदायूं शहर की मुस्लिम जनसंख्या में सुन्नियों की संख्या सर्वाधिक है और उनमें अधिकांश बड़े सरकार और छोटे सरकार को मानने वाले हैं। बदायूं के आम मुस्लिम उसी के साथ रहते हैं, जो बड़े सरकार और छोटे सरकार की सत्ता स्वीकार करता है। समाजवादी पार्टी ने फखरे अहमद नकवी (शोबी) को प्रत्याशी बनाया है, इनके बारे में प्रचारित किया जा रहा है कि यह देवबंदी विचारधाराओं को मानते हैं, जबकि यहाँ देवबंदी विचारधार को मानने वालों की संख्या न के बराबर है। मुस्लिम क्षेत्र में जगह-जगह लोग यह कहते दिखे कि संख्या बल के अनुसार सुन्नी को ही प्रत्याशी बनाया जाना चाहिए था। लोग तो यहाँ तक नारा देने लगे हैं कि जो सरकार का नहीं, वो हमारा भी नहीं।

देवबंदी बनाम सुन्नी को लेकर बात आगे बढ़ी, तो सपा को बदायूं विधान सभा क्षेत्र के साथ आसपास के क्षेत्रों में भी नुकसान हो सकता है। यहाँ बता दें कि जो बड़े सरकार और छोटे सरकार के आगे अपना सिर नहीं झुकाता, उसे बदायूं के आम मुस्लिम स्वीकार नहीं करते, इस दुष्प्रचार से पार पाना सपा प्रत्याशी फखरे अहमद नकवी (शोबी) को आसान नहीं होगा।

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