अरुणेश नीरन की कहानी “तोता सुकुल”

अरुणेश नीरन
अरुणेश नीरन

तोता सुकुल, जवार भर के लिए, तोता सुकुल थे। वैसे, नाम था- वृंदावन नाथ शुक्ल। पिता मथुरा-वृंदावन की यात्रा से लौटे ही थे कि पता चला कि बेटा हुआ है। वृंदावन-बिहारी का प्रसाद मानकर बेटे का नाम रखा गया वृंदावन। बाबा-ईया को तो नाती का मुँह देखना नसीब ही तब हुआ, जब परलोक पधारने की तैयारी वे एक तरह से पूरी कर चुके थे। चारों धाम हो चुका था। रामचन्नर पंडित भागवत सुनाकर यज्ञ करा चुके थे, तुलसी की माला फेरते-फेरते अँगुलियों में घट्ठे पड़ चुके थे। लेकिन नाती ने आकर उनके स्वर्ग सिधारने की इस तैयारी को कुछ काल के लिए जैसे टाल दिया। बाबा नाती को ‘सुगना’ कहते, ईया कहतीं- ‘तोता’। धीरे-धीरे समूचा गाँव उन्हें तोता सुकुल कहने लगा। यह सिलसिला साठ साल पहले शुरू हुआ और अब तक चल रहा है। कागज में नाम है वृंदावन और लोगों की जुबान पर तोता।

तोता दर्जा चार तक पहुँचते-पहुँचते विद्वान हो गए थे। इससे आगे पढ़ने में रखा क्या है? तोता सोचते कि इन्हीं अक्षरों से शब्द बनते हैं और वही शब्द तमाम किताबों में पसरे रहते हैं। जब अक्षर और शब्द का ज्ञान हो गया, तो जिंदगी भर उसी को मथते रहने में क्या धरा है? तोता पढ़ाई छोड़ कर अखाड़े में जाने लगे और हनुमान जी के भक्‍त हो गए। ऐसे पक्के भक्त कि बिना हनुमान जी के उनका कोई काम न सँवरे। खेत में पानी चलाना हो, तो हनुमान जी चलाएँगे, गन्ना छीलना हो, तो हनुमान जी छीलेंगे, रोपनी-सोहनी- सब हनुमान जी के जिम्मे। सिर्फ खाने-सोने-बतियाने का विभाग तोता के पास, बाकी सब के, सब कुछ के इंचार्ज हनुमान जी।

दो नामों का बड़ा सुख। सरकारी कर्ज वृंदावन लें, कर्ज-वसूली के लिए सरकारी अमला पहुँचे तोता सुकुल के पास। तोता कहें – ‘यह वृंदावनवा कौन है? मैं तो उसे जानता ही नहीं !

अमीन-पटवारी ने जब हार मान ली, वसूली के लिए एक दिन तहसीलदार खुद पहुँचा। गाँव के सीवान पर उसकी तोता सुकुल से भेंट हो गई। उसने उनसे वृंदावन नाथ शुक्ल का पता पूछा तो तोता को तो जैसे बिच्छू छू गया – “अरे सरकार, वह तो बहुत बड़ा फ्राडिया है। बड़े-बड़े साहब लोग उसे पकड़ने आए पर पकड़ नहीं पाए। कोई भी सरकारी विभाग ऐसा नहीं, जिससे उसने कर्ज नहीं लिया हो और क्या मजाल कि कोई भी माई का लाल उससे एक छदाम भी वसूल पाया हो… स्साला, घर ही में रहता है और कहला देता है कि पहुनाई में गया है… लेकिन सरकार, आज मैं आपको खाली हाथ नहीं लौटने दूँगा… अभी चलिए, नहीं तो सुनगुन अगर पा लेगा तो साला कहीं निकल भागेगा…”

तहसीलदार के साथ तोता अपने ही दरवाजे पर पहुँचे और भर जोर चिल्लाने लगे “वृंदावन ! ए वृंदावन काका ! घर में हो…?”

भीतर से कोई आवाज नहीं आई तो तोता बोले कि सरकार, घर ही में कहीं छुपा होगा। आप इस मचिया पर बैठिए, मैं भीतर जाकर देखता हूँ कि किस कोने-अंतरे में छुपा है स्साला…। तहसीलदार को बैठाकर तोता घर के भीतर चले गए। वहाँ रस पानी किया, पत्नी से खरी-खुद्‍दी का हिसाब किया, चौकी पर पीठ सीधी की, फिर बाहर आए तो तहसीलदार साहब मचिया पर बैठे-बैठे सो रहे थे।

“सरकार, मैं तो पहले ही कह रहा था कि बड़ा फ्राडिया है स्साला, भीतर भी नहीं है। एक-एक कोठरी देख ली, भुसौला तक छान मारा… खैर, अबकी बार तो साहब को खाली जाना पड़ेगा लेकिन वादा है तोता का कि उसको पकड़कर अदेर हाजिर कर दूँगा आपके सामने… बेटे की कसम लेकर कहता हूँ, आकाश-पाताल-चाहे जहाँ छुपा हो स्साला, मैं ढूँढ़ कर सरकार के सामने कर दूँगा…” तहसीलदार एँड़ी से चोटी तक गदगद। बोला कि, “ठीक है कि वृंदावन नहीं मिला, लेकिन तुमने मिहनत बहुत की। धन्यवाद। जब मिले तो खबर करना। तुम्हारा कभी कोई काम हो तो तहसील में सीधे मेरे पास चले आना।” और तोता की पीठ ठोंक कर साहब विदा हुए।

तोता को बाल बच्चा कोई था नहीं, दवा-दारू झाड़-फूँक सबके बावजूद उनके आँगन में थाल नहीं बजी। अपने मामा की बेटी को गोद लेकर पिता होने की साध पूरी कर रहे थे। वैसे, बात बात पर बेटे की कसम खा लेते और जिसे नहीं पता होता वह इस पर विश्वास भी कर लेता।

एक बार रेल की यात्रा में… तोता सुकुल का नियम था कि कभी रेल का टिकट नहीं लेते और सीट की कौन कहे, बाकायदा बर्थ पर, लेटकर यात्रा करते। यात्रा में वे हाफ पैंट पहनते और घुटने तक पट्टी बाँधकर उस पर गुड़ का रस छिड़क लेते। उस पर जब मक्खियाँ भिनकने लगें तब डिब्बे में घुसें, धक्का-मुक्की करते सीट तक पहुँच जाएँ, किसी के ऊपर भहराकर गिर पड़ें। जब लोग गालियाँ देने लगते तो कहते – क्या करें, भगवान ने ऐसा रोग दे दिया है कि न जीते बनता है न मरते…

“क्या हुआ है तुम्हें।”

“हुआ क्या है? हाथ-पैर फूट-फूट बह रहे हैं, और क्या…।” इतना कहकर आकाश की ओर देखते और कहते – “कितनी घिसनी कराओगे राम ! अब तो ले चलो…।”

मिनट भर में सीट खाली और तोता मजे में सीट पर पसर जाएँ। एक बार रास्ते में टी.टी. आ पहुँचा। आते ही टिकट चेक करने लगा। तोता की बगल वाले यात्री के पास टिकट नहीं था। टी.टी. ने उससे बीस रुपये चार्ज किए। जब वह तोता के पास पहुँचा तो तोता अचकचा कर बाहर देखने लगे। दुबारा माँगने पर झुँझलाकर उसकी तरफ लगातार देखते हुए कहना शुरू किया – टिक्कस? यह क्या होता है? मैं जिंदगी में पहली बार रेल पर बैठा हूँ। खलीलाबाद टेसन पर एक ठो काला-काला पहने मिला था, उसने दस रुपये माँगे तो मैंने दे दिए। अब तुम माँग रहे हो। इस रेल में सारे के सारे मँगते ही रहते हैं क्या?

टी.टी. नाराज। कहने लगा तू फ्राड आदमी है। अगला स्टेसन आने दो वहाँ उतार कर जेल भिजवा दूँगा, तुम्हारे जैसे फ्राडियों की दवा मैं जानता हूँ…”

गाड़ी कुछ आगे बड़ी तो मजिस्ट्रेट चेकिंग शुरू हो गई। तोता पकड़े गए। मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुए तो सहसा, भोंकार छोड़ के रोने लगे। कचकचा कर पकड़ लिए मजिस्ट्रेट के दोनों पैर। वे बेचारे गिरते-गिरते बचे। डाँटकर पैर छोड़ने को कहा। तोता ने और जोर से पकड़ लिया और रो-रो कर कहने लगे – दुहाई सरकार। मैं गाँव का बुड़बक मनई। जिंदगी में पहली बार रेल पर बैठा। एक जने ने टेसन पर रुपया लेकर बैठा दिया। गाड़ी में टी.टी. बाबू आए और उन्होंने भी बीस रुपये ले लिए। मैं गरीब आदमी सरकार, मुझे इस जुलुम से बचाइए…”

माजिस्ट्रेट को पता नहीं दया आई कि नहीं, लेकिन अपने पैर तो उसे छुड़ाने ही थे। उसने टी.टी. को तलब किया। टी.टी. लगा जैसे रो देगा – “सरकार, मैंने इससे कोई पैसा नहीं लिया। वह बिना टिकट चल रहा था। पेनाल्टी देने को भी तैयार नहीं था। मैंने सिर्फ इतना ही कहा था कि अगले स्टेशन पर उतार दूँगा, सजा से बचने के लिए यह नाटक कर रहा है सरकार।”

“दुहाई सरकार की। झूठ जो बोलूँ तो मेरा जवान बेटा मर जाए। इन्होंने मुझसे बीस रुपये लिए सरकार। इनकी जमा-तलाशी ली जाए, मेरा दिया नोट इनकी थैली में मिलेगा। उस पर रोशनाई लगी है सरकार…।”

टी.टी. की तलाशी ली गई। बीस का एक नोट मिला जिस पर रोशनाई लगी थी। यही वह नोट था जिसे तोता के पड़ोसी मुसाफिर से टी.टी. ने वसूल किया था। अब तोता के चहरे पर चमक, टी.टी. का मुँह काला। माजिस्ट्रेट ने तोता का बयान लिखा, नाम-पता नोट किया और उन्हें छोड़ दिया।

तोता बाहर निकलकर इक्के पर बैठे और चल पड़े। थोड़ी दूर आगे बढ़ा तो देखा कि टीटी दौड़ा चला आ रहा है। इक्केवान को आदेश हुआ कि भगाओ इक्का। अब शुरू हुई टीटी और इक्के की दौड़। यह दौड़ पूरे कोस भर चली। टीटी साहब बेदम। लगा कि भहराकर गिर पड़ेंगे। इक्का रुका।

“का हो ! हमसे टिकट माँगोगे ? तोता सुकुल से टिकट ?”

“अरे बईमान, एक तो बिना टिकट चला, ऊपर से दूसरे के दिए बीस के नोट को अपना बताकर हमें फँसवा दिया, अब क्या नौकरी भी लेगा?”

“नौकरी नहीं जाएगी तुम्हारी। दो सौ रुपए दे दो हमें और जाओ मस्त रहो…”

“अब रुपया भी लेगा हमसे? फ्राडिया कहीं का…”

“तो इक्केवान, चल हाँक जोर से इक्का। जल्दी पहुँचना है…”

दौड़ फिर से शुरू हो गई। घोड़े और आदमी में। कभी घोड़ा आगे बढ़ चला कभी आदमी। आखिर में टीटी साहब जैसे मिर्चा लगाकर दौड़े और घोड़े के आगे खड़े हो गए, इक्का रुक गया।

“ले ले बईमान ये दो सौ रुपये, और लिखकर दे माजिस्ट्रेट को लिखाया गया तुम्हारा बयान झूठा था।”

तोता सुकुल ने रुपया लेकर थैली में रखा और पान थूककर बोले – जाओ मौज करो, कोई तुम्हारा बाल बाँका नहीं कर पाएगा।

“बिना तुम्हारे दिए साबित कैसे होगा कि मैं निर्दोष हूँ? लिखित नहीं होगा तो मेरी नौकरी चली जाएगी।”

“मैंने कहा न कि नहीं जाएगी नौकरी। बयान में जो नाम-पता मैंने लिखवाया है वह सब फर्जी है मेरे बच्चे। माजिस्ट्रेट का बाप भी उस नाम के किसी आदमी को इस दुनिया में कहीं ढूँढ़ नहीं पाएगा। माथे का पसीना पोंछ लो और निश्‍चित होकर पधारो…”

अकबकाए हुए टी.टी. जब तक कुछ सोचें तब तक एक्का फुर्र हो चुका था।

एक दिन होते प्रातः तोता सुकुल हाजिर। नई कुर्ता-धोती में लकलक।

“क्यों जी, इतने सबेरे? कल तो कचहरी में तारीख थी तुम्हारी, क्या हुआ?”

“होगा क्या! मुकदमा खारिज। लो लौंगलता खाओ। उस बेईमान को ऐसे पटकनी दे कि अभी तक सहला रहा होगा साला…”

“महज तीन तारीख में मुकदमा खारिज?”

तोता सुकुल ने अपने गाँव के एक साहू से पाँच हजार रुपए, ब्याज पर कर्ज लिए थे। पुरनोट लिखवाकर उसने उधार दिया था। तीन महीने में मूल लौटाने की शर्त थी, लेकिन जब दो साल तक सूद-मूल कुछ भी नहीं मिला तो साहू ने कचहरी में नालिस कर दी। कल उसी की तीसरी पेशी थी।

“पता है कि कैसे इतनी जल्दी उस बेईमान साले से छुट्टी मिली?”

“मुझे क्या पता…”

“तो सुनो। कल कचहरी में वह मिला। मेंने चाय-पानी के लिए पूछा और कहा कि भाई, मुझे याद नहीं आ रहा कि पुरनोट में मैंने क्या लिखा है, तनिक दो तो देखूँ… अगर उसमें जितना तुम बता रहे हो उतना रुपया लिखा हो तो अभी-का-अभी गिन दूँ। रुपया मैं लेकर आया हूँ। एक ही गाँव के हम रहने वाले, आपस में झगड़ा-टंटा होना नहीं चाहिए। बाहर ही सलटा लिया जाए तो हम लोगों के साथ-साथ गाँव-घर की भी इज्जत रह जाएगी… उसने बैग से निकालकर पुरनोट थमा दिय। मैंने उसे देखते-देखते अचानक मुँह में डाला और खा कर नीम के दातून से जिब्भा कर लिया। अब वह साला क्या करे… रोता-कलपता घर लौट गया, मन भर गरियाते गरियाते। मुकदमा खरिज…”

“तो बेईमान इसमें कौन हुआ?”

“मैं जानता था कि तुम यही सवाल करोगे।” गाँव भर को ठग कर उसने अपनी तिजोरी भर रखी है। जो उसकी खाता-बही में एक बार टँग गया फिर कभी उतर नहीं पाया। गरीबों का खून चूसता रहता है साला। मैंने उसका चूस लिया। वह साला पिशाच तो मैं भी बर्हम। बर्हम तो भूत-पिशाच को ही खाता है, मैं भी खा गया…”

इतना कहकर तोता सुकुल ठठाकर हँसे और डिब्बे में से एक लौंगलता निकाल कर चल पड़े।

एक दिन सबेरे-सबेरे उनके घर गया तो वे बाँस छील रहे थे।

“आओ बाबू आओ…।”

“टोले-मुहल्ले का कोई चला गया क्या कि सुबह-सुबह यह बाँस…”

“अरे नहीं। बाँस में बहुतेरे गुन है। यह गरीबी का सहोदर भाई है। गरीब जिंदगी भर सीढ़ी ही बना रहता है। लोग उस पर चढ़ कर ऊँचे हो जाते हैं लेकिन वह जहाँ-का-तहाँ पड़ा रहता है। अंत में अर्थी पर चढ़कर राम नाम सत्य हो जाता है। सीढ़ी और अर्थी तो एक ही होती है। एक दूसरे को चढ़ाती है, दूसरी खुद भी जल जाती है। यह सब बाँस ही तो करता है।”

“तुम तो भाई संतों की तरह बोल रहे हो…”

“बाँस जैसा संत कौन हो सकता है? यह लचकदार है, हरा और लंबा – चाहे काटकर सीढ़ी बना लो और धरती छोड़कर जिंदगी की छत पर चढ़ जाओ, चाहो तो अर्थी बना लो और सीधे स्वर्ग पहुँच जाओ। उसे काटो, पीतो, छीलो, चीरो, मोड़ो-वह कुछ भी नहीं बोलेगा, लोगों को जिंदगी की छत पर या परमात्मा की छत पर पहुँचाता रहेगा।”

“तुम भी तो, इतने ज्ञान के बाद भी, इसे छील ही रहे हो…”

“मैं नहीं छीलूँगा तो कोई और छीलेगा। बंसवारी में यह कब तक झूलता रहेगा। लोग इसे झूलने देंगे? गरीब को कोई झूलने देता है?”

“गरीब आदमी से इसे मत जोड़ो सुकुल। बाँस और आदमी में फर्क होता है।”

“कोई फर्क नहीं होता वह भी कटता-पिटता है और कुछ कह नहीं पाता। दूसरों के लिए सीढ़ी बनते-बनते ही उसकी जिंदगी खतम हो जाती है। देखो, मंदिर में आदमी माथा टेकने जाता है, लेकिन जिस मंदिर में भगवान रहते हैं उसे बनाता कौन है? पत्थर-मिट्‍टी तोड़कर घाम में जलते हुए और खुद को जलाते हुए मजूरे जब उसे बना देते हैं, तब तुम उसमें माथा टेकने और भीख माँगने जाते हो, डोलची में भगवान के सिंगार-पटार का सामान लेकर, जिस डोलची को बाँस के गात-गात को चीर फाड़ के बनाया जाता है। भगवान के सिंगार के सामान ढोने वाले और उनका घर बनाने वाले को कोई पूछता है? इसलिए कह रहा था कि गरीब आदमी और बाँस सहोदर हैं। अब यह पुराण छोड़ो और भेली खाकर पानी पियो।

लेकिन एक दिन बाँस की अर्थी भी धोखा खा गई।

तोता सुकुल अपनी बेटी की नंद की शादी में गए थे। बेटी के दरवाजे पर आगवानी की तैयारी हो रही थी कि तोता सुकुल के मुँह-पेट दोनों चलने लगे।

एक-दो लोग लगे और उन्हें लादकर अस्पताल पहुँचा दिया। हैजा वार्ड में भर्ती तोता सुकुल का कोई पुछवैया नहीं था। सभी शादी में व्यस्त और मस्त।

दूसरे दिन अस्पताल के आदमी ने बताया कि कल हैजा वार्ड में भर्ती मरीज आज सबेरे मर गया। लाशखाने में लाश रखी है। कागज-पत्र भरकर जो वारिस हो लाश ले ले। तोता के बेटी-दामाद रोने लगे। लोगों ने चुप कराया और कहा कि शादी के घर में लाश कैसे लाई जाएगी। बराती जानेंगे तो लौट जाएँगे। कोई जाने मत… बाजार से ही अर्थी, धूप, लोहबान, कफन वगैरह खरीदकर सीधे अस्पताल चला जाए और बाहर ही बाहर मसान पर जाकर फूँक आया जाए।

तीन-चार लोगों के साथ तोता के दूर का एक भतीजा अस्पताल पहुँचा। पूरी तैयारी के साथ। अर्थी-धूप-लोहबान-अगरबत्ती सब कुछ पहले ही खरीदा जा चुका था। बस पंचनामा बनाकर अस्पताल से लाश उठा लेना था।

अस्पताल में हड़कंप मचा था। लाशघर से लाश गायब। कर्मचारियों ने एक-एक लाश को उलट-पुलट कर देख लिया, लेकिन तोता की लाश का कहीं पता ही नहीं। लाश तो यहीं थी… तो गई कहाँ? धरती खा गई कि आसमान !

मुझे तोता के मरने की सूचना मिली तो मैं भी अस्पताल जाने के लिए निकला। थोड़ी ही दूर चलने पर देखता क्या हूँ कि एक मरियल-सा आदमी एकदम चीकट गमछा लपेटे हुए लड़खड़ाता चला आ रहा है। लगता था, जैसे कब्र फोड़कर कोई कंकाल सड़क पर आ गया है।

नजदीक पहुँचने पर मेरा माथा फिर गया। वे साक्षात तोता सुकुल उर्फ वृंदावन नाथ शुक्ल थे, जिनकी लाश शवयत्री और अस्पताल के कर्मचारी तब से ढूँढ़ रहे थे।

“तोता, तुम तो जीवित हो !”

“तो तुम क्या समझ रहे हो कि मरा हुआ आदमी सड़क पर चलेगा?”

“अस्पताल से खबर आई थी कि तुम मर गए… लोग सामान लेकर अस्पताल पहुँचे हैं और तुम…”

“बैठो,” तोता सड़क किनारे पड़े एक पत्थर पर जैसे भहरा गए।

“बताओ, माजरा क्या है?”

“अरे बाबू, सबेरे डाक्टर स्साला राउंड पर आया और मेरी नाड़ी देखकर नर्स से कहने लगा कि यह मरीज मर गया है, इसकी नाड़ी गायब है। बेड खाली करा के इसे लाशघर में भिजवाओ और इसके घर वालों को खबर कर दो… बाबू, इसके बाद स्सालों ने मुझे उठा के लाशघर में ले जाकर पटक दिया…”

“डाक्टर यह कह रहा था तो तुम्हें होश था?”

“पूरंपूर।”

“तो कहा क्यों नहीं कि मैं जिंदा हूँ?”

“मारे रिस के नहीं बोला। जीते आदमी को स्साले ने मुर्दा कहा तो मारे रिस के मेरा ब्रह्मांड जलने लगा। मैंने भी सोचा कि स्साले, ऐसा बदला लूँगा कि तुम्हारे सात पुस्त वाले याद करेंगे। अब ढूँढ़ों तोता की लाश…”

“यह तो अनर्थ हो गया तोता। चलो फिर से अस्पताल, सभी वहाँ परेशान होंगे…।”

“कोई नहीं परेशान होगा। घर के लोग अस्पताल वालों को गरियाकर लौट आएँगे घर आकर बारात-मरजाद का इंतजाम करना है। और अस्पताल वाले फिर से जिंदा लोगों को मार डालने में लग जाएँगे। तोता के बारे में सोचने की किसे फुरसत है। उन सबों को थोड़ा नाचने दो” – तोता बोलते जा रहे थे – “मुझे इतना दर्द था कि बोला नहीं जा रहा था, उस दर्द को कोई प्रेम से आला लगाकर देखता तो समझता कि भीतर कैसी आग लगी हुई है। वे स्साले आग से आग बुझाने की कोशिश में लगे थे। इससे आग बुझेगी कि धधकेगी और ! वही धधक रही है। इसीलिए बिना बताए भाग आया हूँ, मैं जल रहा हूँ तो तुम भी स्सालों, जलो !”

“लेकिन घरवाले अस्पताल में परेशान होंगे, खबर करना जरूरी है…”

“जाओ खबर कर दो, मैं आज तुम्हारे ही घर रहूँगा। मरजाद बीत जाने के बाद बेटी के घर जाऊँगा।”

तोता को अपने घर पहुँचाकर मैं अस्पताल जाने लगा तो तोता ने रोका और कहा – देखो, जो सामान है सारा, लेते आना…

“कौन सामान ?”

“अरे वही, जो मेरी लाश जलाने के लिए खरीदा गया है – लोहबान, अगरबत्ती धूप-घी-लकड़ी और अर्थी…”

“अरे यह सब क्या करोगे भाई?”

“लकड़ी पर खाना बनेगा, घी से दाल बघारी जाएगी, अगरबत्ती जला के हनुमान जी की पूजा करूँगा…”

“और अर्थी?”

इतनी लौकियाँ फली हैं छ्प्पर पर… उसी अर्थी की सीढ़ी पर चढ़कर तोड़ूँगा, तोड़कर चीरूँगा, चीरकर कर छौंकूँगा, छौंककर तरकारी बनाऊँगा, बनाकर खाऊँगा, मेरे घर आओगे, तो तुम्हें भी खिलाऊँगा…

 

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