सूचना आयोग ही करना चाहता है आरटीआई की हत्या

सूचना आयोग ही करना चाहता है आरटीआई की हत्या
सूचना आयोग ही करना चाहता है आरटीआई की हत्या

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र गणराज्य घोषित किया गया। भारत में 26 जनवरी 1950 को विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान विधिवत लागू किया गया, जिसमें जनता को मालिक बताया गया। भारत के अपने नये संविधान में भी अंग्रेजों के बनाये कानूनों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया, जिसमें शासकीय गोपनीयता अधिनियम- 1923 भी सम्मिलित था, इस अधिनियम के चलते सरकार जनता से सूचनायें छुपाती रही, इसीलिए मालिक होने के बावजूद जनता मालिक होने की अनुभूति नहीं कर पा रही थी। जनता सूचना मांगने लगी, तो सरकार अधिकार न होने का हवाला देते हुए मना करती रही, इस बीच वर्ष 1975 में उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राज नारायण नाम से एक प्रकरण उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गया, तो उच्चतम न्यायालय ने सार्वजनिक कार्यों की जानकारी जनता को प्रदान करने का आदेश पारित कर दिया। उच्चतम न्यायालय के इस आदेश के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (ए) के तहत नागरिकों को मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा बढ़ गया और सूचना के अधिकार तक पहुंच गया, लेकिन सरकारों ने इसे विधिवत लागू नहीं किया।

द्वितीय प्रेस आयोग ने वर्ष- 1982 में शासकीय गोपनीयता अधिनियम- 1923 की विवादास्पद धारा- 5 को निरस्त करने की सिफारिश की थी, इसके बाद वर्ष- 2006 में वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में गठित द्वितीय प्रशासनिक आयोग ने भी इस कानून को निरस्त करने की सिफारिश की, लेकिन सरकार ने सिफारिशों को गंभीरता से नहीं लिया, तो जनता सूचना के अधिकार की मांग करने लगी। राजस्थान में सूचना के अधिकार के लिए आंदोलन होने लगा। वर्ष- 1989 में कांगेस की सरकार गिरने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सूचना का अधिकार कानून बनाने का वायदा किया। वर्ष- 1997 में केन्द्र सरकार ने एच. डी. शौरी की अध्यक्षता में सूचना के अधिकार से संबंधित प्रारूप बनाने को एक कमेटी गठित की, जिसने कुछ महीनों में ही प्रारूप बना कर सरकार को सौंप दिया, पर विश्वनाथ प्रताप सिंह तमाम प्रयासों के बावजूद इसे लागू नहीं कर पाये और बाद की सरकारों ने इसे दबा दिया।

सूचना के अधिकार की मांग तेज होती चली गई, तो वर्ष- 2002 में संसद ने सूचना की स्वतंत्रता विधेयक पारित किया। इसे जनवरी- 2003 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली, लेकिन नियमावली बनाने के नाम पर सरकार ने इस विधेयक को लागू नहीं किया। भारत में कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी, जिसने सूचना की स्वतंत्रता विधेयक- 2002 को निरस्त करते हुए 12 मई 2005 को सूचना का अधिकार अधिनियम संसद में पारित कर दिया, जिसे 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की संस्तुति मिली और 12 अक्टूबर 2005 को कानून देश में लागू कर दिया गया।

सूचना अधिकार अधिनियम- 2005 लागू भले ही हो गया है, लेकिन शासन-प्रशासन में बैठे लोग इस कानून के अक्षरशः लागू होने में बाधायें उत्पन्न कर रहे हैं। चूँकि आरटीआई से देश भर में भ्रष्टाचार से संबंधित खुलासे हो रहे हैं, जिससे तंत्र में बैठे भ्रष्ट लोग डरे हुए हैं और देश के शीर्ष नेता भी उन डरे हुए भ्रष्ट लोगों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। इस कानून को पारित कराने वाले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ही आरटीआई कानून के दायरे को कम करने और गोपनीयता बढ़ाने की बात कह चुके हैं, इसी तरह जनता को शक्तिशाली बनाने की बात करने वाले वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस कानून के संबंध में कह चुके हैं कि आरटीआई किसी को खाने के लिए नहीं देता। किसी विषय पर देश के प्रधानमंत्री की ही ऐसी राय हो, उसे व्यवस्था में बैठे लोग कितनी गंभीरता से लेंगे, यह समझ पाना कठिन कार्य नहीं है, जबकि विश्व में ऐसे भी देश हैं, जहाँ की सरकारें आरटीआई के तहत स्वतः सूचनायें सार्वजनिक करती हैं, इसीलिए उन देशों का लोकतंत्र भी अधिक मजबूत है, क्योंकि वहां की जनता का लोकतंत्र पर विश्वास लगातार बढ़ रहा है। लोकतांत्रिक दृष्टि से सूचनाओं को छुपाना ही अपराध होना चाहिए, ऐसे में सूचना मांगने वाले को ही अपराधी सिद्ध कर देना भयावह हालात ही कहे जायेंगे, जो उत्तर प्रदेश में बन गये हैं। स्तब्ध कर देने वाली घटना ही कही जायेगी कि यूपी के राज्य सूचना आयुक्त हाफिज उस्मान ने आरोपी की शिकायत पर आवेदक के विरुद्ध कार्रवाई करा दी है।

जिला बिजनौर के निवासी ललित कुमार शर्मा ने जिला पंचायत राज अधिकारी- बिजनौर से सूचना मांगी कि ग्राम पंचायत इलायचीपुर खड़गू के वर्तमान प्रधान द्वारा ग्राम प्रधान बनने से लेकर अब तक मनेरगा के अन्तर्गत प्रत्येक वर्ष कुल कितना धन लाभार्थियों को वितरित किया गया, उसकी वर्षवार प्रमाणित सूची उपलब्ध कराई जाये, जो उसे उपलब्ध नहीं कराई गई, तो ललित कुमार शर्मा ने राज्य सूचना आयोग के समक्ष अपील की, जिस पर आयुक्त हाफिज उस्मान ने जिला पंचायत राज अधिकारी- बिजनौर को सूचना का अधिकार अधिनियम- 2005 की धारा 20 (1) के तहत नोटिस जारी कर दिया। जिला पंचायत राज अधिकारी के स्थान पर ग्राम पंचायत अधिकारी सतेन्द्र कुमार आयुक्त के समक्ष पहुंचे और उन्होंने लिख कर दिया कि वादी ललित कुमार शर्मा आये दिन विभिन्न ग्राम पंचायतों की सूचना मांगते रहते हैं, तथा ग्राम प्रधान व ग्राम पंचायत अधिकारियों से अवैध धन की मांग करते हैं, साथ ही उन्होंने लिखा कि वादी ने उससे इलायचीपुर खड़गू की सूचना के सम्बन्ध में दो/तीन हजार ईटें व रूपये दिलवाने की मांग की थी और न देने पर परेशान करने की धमकी दी थी।

राज्य सूचना आयुक्त हाफिज उस्मान ने आरोपी सतेन्द्र कुमार की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए पुलिस अधीक्षक- बिजनौर को सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 की धारा- 18 (2) के तहत निर्देश दिया कि सतेन्द्र कुमार के प्रार्थना- पत्र में उठाये गये बिन्दुओं की जांच कर आख्या आयोग के समक्ष पेश करें। पुलिस अधीक्षक- बिजनौर की ओर से निरीक्षक पंकज श्रीवास्तव उपस्थित हुए। उन्होंने आयोग के समक्ष जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें पाया गया कि सूचना मांगने वाले ललित कुमार शर्मा द्वारा ग्राम पंचायत से ईंट व रूपये मांगे गये, इस पर जिला बिजनौर के थाना हल्दौर में ग्राम इलायचीपुर खड़गू निवासी गजेन्द्र सिंह की लिखित तहरीर के आधार पर मुकदमा अपराध संख्या- 82/15 धारा- 384 आईपीसी पंजीकृत कर लिया गया, इसे आयुक्त उस्मान हाफिज अपनी उपलब्धि मान रहे हैं, जबकि उन्होंने पद और शक्तियों का दुरूपयोग करते हुए आरटीआई के शरीर पर बड़ा सा घाव दिया है, जिसके दर्द से आरटीआई चीखता महसूस हो रहा है।

बी.पी. गौतम
बी.पी. गौतम

उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग द्वारा इससे पहले भी आवेदकों के विरुद्ध कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है, यहाँ सवाल यह है कि सूचना मांगने पर जनसूचना अधिकारी, अथवा संबंधित अधिकारी से आवेदक रूपये क्यों मांगेगा और कोई अगर, मांग रहा है, तो संबंधित अधिकारी उसके दबाव में क्यों आ रहा है? उसका काम आवेदक को सूचना उपलब्ध कराना है, जो उसे विधिवत उपलब्ध करा देनी चाहिए। आयोग का भी इतना ही कार्य है कि आवेदक द्वारा मांगी गई सूचनायें दायरे में आती हैं, तो उसे उपलब्ध करवाये और न देने वाले को दंडित करे, जबकि उत्तर प्रदेश का आयोग कुछ और ही कर रहा है। सूचना का अधिकार मांगने की सबसे पहले न्यायिक लड़ाई लड़ने वाले उत्तर प्रदेश का आयोग आरोपियों की शिकायत पर आवेदकों को ही प्रताड़ित कर रहा है, इस ओर भारत के मुख्य सूचना आयुक्त, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि यह शुरुआत परंपरा बनती चली गई, तो पूरी तरह लागू होने से पहले ही सूचना अधिकार अधिनयम की हत्या हो सकती है।

 

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