जुआरियों ने क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया

जुआरियों ने क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया
जुआरियों ने क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया

किसी की भी उत्पत्ति और विकास जिन कारणों से हुआ हो, वे गुण-अवगुण अंत समय तक बने रहते हैं। क्रिकेट की बात करें, तो यह खेल मूल रूप से ब्रिटेन के मूल निवासियों का है, जिसका अविष्कार वहां के निम्न वर्गीय बच्चों ने किया। क्रिकेट कब से खेला जाता है, इसके सटीक प्रमाण नहीं हैं, पर माना जाता है कि यह खेल 16वीं शताब्दी से पहले भी खेला जाता था। 1597 में ब्रिटेन की एक अदालत में एक भूमि संबंधी विवाद में जॉन डेरिक नाम के एक बुजुर्ग ने अपनी गवाही के दौरान बताया था कि वह 50 वर्ष पहले विवादित भूखंड पर क्रिकेट खेलता था, जिससे सिद्ध हुआ कि बच्चे क्रिकेट उससे पहले भी खेलते रहे होंगे।

क्रिकेट निम्न वर्ग से मध्य वर्ग के बीच आया और मध्य वर्ग से उच्च वर्ग तक पहुंच गया, साथ ही बच्चों के साथ वयस्क भी क्रिकेट खेलने में रूचि लेने लगे, तो क्रिकेट ने जुआरियों का ध्यान आकर्षित कर लिया। जुआरी शर्तें लगाने लगे, तो क्रिकेट में रूचि और आक्रामकता बढ़ती चली गई। जुआरियों को बड़ी रकम मिलने लगी, तो उन्होंने अपनी टीमें बनानी शुरू कर दीं। क्रिकेट इतना अहम हो गया कि ब्रिटेन में 1664 में विधिवत जूआ अधिनियम पारित हुआ, जिसमें अधिकतम सौ पाउंड तक की शर्त लगाने की मान्यता दे दी गई। इसके अलावा प्रेस को स्वतंत्रता मिली, तो क्रिकेट की खबरें प्रमुखता से छपने लगीं, जिससे क्रिकेट ब्रिटेन में अत्यधिक लोकप्रिय खेल बनता चला गया। ब्रिटेन के लोग जहाँ गये, वहां तक क्रिकेट फैलता चला गया। 1844 में पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच अमेरिका और कनाडा के बीच खेला गया। क्रिकेट पर युद्ध के दौरान कई बार बड़ा संकट भी गहराया, लेकिन सभी संकटों से उबरते हुए 19वीं सदी में क्रिकेट विश्व के कई देशों में प्रमुखता से खेला जाने लगा।

ब्रिटेन के निवासियों का रंग, उनकी भाषा, खान-पान, रहन-सहन और उनके खेल बाकी देशों से भिन्न हैं, लेकिन उन्होंने विश्व पर शासन किया है, जिससे वे दुनिया भर में गये और जहाँ भी गये, वहां के लोगों को उन्होंने स्वयं से हीन माना, उनका अपमान किया, इसलिए दुनिया भर के लोग ब्रिटेन के लोगों से ईर्ष्या करते हैं। कुछ देशों के लोग तो ब्रिटेन के लोगों से एक सीमा से अधिक घृणा करते हैं, ऐसे देशों में से एक भारत भी है। ब्रिटेन के अधीन रहने के चलते भारतीय भी ब्रिटेन के लोगों से ईर्ष्या करते हैं, लेकिन उनकी भाषा और उनके प्रिय खेल क्रिकेट को जीवन में लगातार उतारते जा रहे हैं। ब्रिटेन की भाषा को लेकर भारत में ऐसे हालात हैं कि अंग्रेजी बोलने वाले को निःसंदेह बड़ा ज्ञानी माना जाता है। अंग्रेजी बोलने वालों के भारतीयों के समूह में ही सिर्फ हिंदी बोलने वाले को बड़ी ही हीन दृष्टि से देखा जाता है, ऐसे ही हालात क्रिकेट को लेकर हैं। भारत सरकार क्रिकेट नहीं खिलाती। ब्रिटेन के जुआरियों की भांति ही एक क्रिकेट बोर्ड है, जो टीम का चयन करता है और क्रिकेट खिलाता है, इसके बावजूद भारत में क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर का सम्मान किसी राजनेता, समाजसेवी और महापुरुष से कम नहीं है, साथ ही भारत सरकार उन्हें भारत रत्न की उपाधि दे चुकी है।

दुःख की बात यह है कि भारत सरकार से ऊपर जाकर क्रिकेट बोर्ड ने क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया है। भारत और पाकिस्तान की मूल रंजिश को वो क्रिकेट में भुना लेता है। एक झटके में अरबों-खरबों पैदा कर लेता है, इससे भारत के हालात और अधिक खराब हो रहे हैं। ग्लैमर और अपार धन के चलते युवा क्रिकेटर की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे भारत के मूल खेलों पर बड़ा संकट गहरा रहा है, साथ ही क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ने के कारण पाकिस्तान और भारत के जनमानस के बीच क्रिकेट बोर्ड खाई और गहरी कर देता है, जिसका दुष्परिणाम आम जनमानस को ही नहीं, बल्कि दोनों राष्ट्रों को विभिन्न रूपों में झेलना पड़ता है, इसलिए भारत सरकार को विश्व समुदाय के समक्ष स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि क्रिकेट भारत का आधिकारिक खेल नहीं है और न ही इसका भारत की आन, बान, शान से कोई मतलब है। क्रिकेट की हार-जीत को मात्र उन खिलाड़ियों की ही हार-जीत माना जाये, जो इस खेल में भाग ले रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं ट्वीटर पर क्रिकेट को लेकर ट्वीट कर रहे हैं, ऐसे में यह संभावना कम ही है कि वे भारत में क्रिकेट पर अंकुश लगाने का विचार भी करेंगे।

बी.पी.गौतम
बी.पी.गौतम

खैर, बात अमेरिका और चीन की करते हैं। विश्व के तमाम देशों की तरह इन दोनों देशों के नागरिक भी ब्रिटेन के लोगों से ईर्ष्या करते हैं, लेकिन भारतीयों की तरह सिर्फ दिखावा नहीं करते। अमेरिका और चीन के नागरिक ईर्ष्या को आज तक निभा रहे हैं। विश्व का प्रथम मैच खेलने वाले अमेरिका में लोग क्रिकेट का नाम तक लेना पसंद नहीं करते। ब्रिटेन की मूल भाषा अंग्रेजी की जगह उन्होंने अपनी भाषा का अविष्कार किया, जो अब ब्रिटेन की अंग्रेजी की तरह ही विश्व भर में फैल चुकी है। क्रिकेट के खेल में गेंद हाथों में रहती है, इसलिए अमेरिका ने फुटबाल को अपनाया, वे गेंद को पैर से खेलते हैं। ब्रिटेन में चार्ल्स नाम बेहद लोकप्रिय और सम्मानित है, लेकिन अमेरिकी यह नाम कुत्तों को देना ज्यादा पसंद करते हैं, ऐसे ही हालात क्रिकेट को लेकर चीन में हैं। विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश चीन में लोग क्रिकेट का नाम तक नहीं जानते। इन दोनों देशों में क्रिकेट न होने के कारण जुआरियों को बड़ा नुकसान हो रहा है, इसलिए वे इन दोनों देशों में क्रिकेट फैलाने के प्रयास लगातार कर रहे हैं और जुआरियों की मदद कर रहे हैं अप्रवासी, जिनमें भारतीयों का नाम सबसे ऊपर है।

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