दलीय और जातीय राजनीति का शिकार हुआ बदायूं कांड

कटरा सआदतगंज स्थित पीड़ित परिवार से मिलने जाने से पूर्व बदायूं लोकसभा क्षेत्र के पूर्व भाजपा प्रत्याशी वागीश पाठक के आवास पर भोजन ग्रहण करते भाजपा के शीर्ष नेता व नेत्री। बता दें कि वागीश पाठक के पिता प्रेम स्वरूप पाठक भाजपा के जिल्ध्यक्ष भी हैं।
कटरा सआदतगंज स्थित पीड़ित परिवार से मिलने जाने से पूर्व बदायूं लोकसभा क्षेत्र के पूर्व भाजपा प्रत्याशी वागीश पाठक के आवास पर भोजन ग्रहण करते भाजपा के शीर्ष नेता व नेत्री। बता दें कि वागीश पाठक के पिता प्रेम स्वरूप पाठक भाजपा के जिलाध्यक्ष भी हैं।

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में स्थित उसहैत थाना क्षेत्र का गाँव कटरा सआदतगंज आज कल घिनौनी राजनीति का राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र बिंदु बना हुआ है। दुःखद और शर्मनाक घटना को दलीय और जातीय मकड़जाल में इस कदर उलझा दिया गया है कि सच पूरी तरह दबता जा रहा है।

बदायूं जिला मुख्यालय से पूरब-दक्षिण दिशा में 45 कि.मी. दूर बसे इस गाँव के आसपास कटरी है, जहां से फरुखाबाद की सीमा दो-तीन कि.मी. दूर रह जाती है। जिला कासगंज और जिला शाहजहांपुर की सीमा सात-आठ कि.मी. दूर है। गाँव से बाहर निकलते ही गंगा बह रही है। यह सच है कि यह क्षेत्र जाति विशेष के प्रभुत्व में रहा है। सामान्यतः इस क्षेत्र में कानून का भी राज कम ही रहा है। यह क्षेत्र डाकुओं की शरणस्थली के रूप में सदियों कुख्यात रहा है, लेकिन अब हालात बदल गये हैं। छविराम, पोथी, रमेश, बड़े लल्ला, नरेशा, नरेशा धीमर, रानी ठाकुर, नाहर सिंह उर्फ नहरुआ जैसे दुर्दांत डकैतों की आसपास के कई जिलों में दहशत रही है, इनके द्वारा की गईं आपराधिक वारदातों से प्रदेश सरकार तक हिल गई थी। कलुआ डकैत ने पुलिस को बड़ी क्षति पहुंचाई, उसने डेढ़ दर्जन से अधिक पुलिस के जवानों को मौत के घाट उतार दिया था, लेकिन पुलिस मुठभेड़ में कलुआ के मारे जाने के बाद यह कटरी क्षेत्र लगभग दस्यु मुक्त हो गया। जातिगत दबदबे की बात करें, तो इनमें से अधिकांश डकैत गैर यादव थे और अधिकांश डकैत क्षेत्रीय दबंगों और पुलिस के शोषण के चलते अपराध की दुनिया में जाने को मजबूर हुए।

कटरी क्षेत्र में यादव, मौर्य और मल्लाह बड़ी संख्या में हैं, इनमें से जिसको सत्ता की आंशिक मदद भी मिल जाती है, वही दूसरे पक्ष का शोषण करने लगता है। फिलहाल उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है, जिससे यादवों का मनोबल स्वाभाविक ही बढ़ा हुआ है। अधिकाँश छोटी-मोटी घटनाओं में पुलिस यादवों के विरुद्ध कार्रवाई भी नहीं करती, जिससे आपराधिक प्रवृत्ति के लोग दुस्साहसी होते चले जाते हैं, यही वह प्रमुख कारण है कि समूचे इलाके की जनता फिलहाल यादवों के विरुद्ध खड़ी नज़र आ रही है।  

दुष्कर्म और दो बहनों की मौत की चर्चित घटना तो सिर्फ आधार है। असलियत में आम जनमानस यादवों का बढ़ा मनोबल गिराने के पक्ष में एकजुट है। इस घटना से बहुत कुछ बदल भी गया है। हाल-फिलहाल समूचे इलाके के यादव दहशत में हैं। चाल और व्यवहार में बड़ा परिवर्तन आ गया है और बहुत आवश्यक न होने पर सामान्यतः मुख्य बाजार की ओर आने से भी बच रहे हैं। यह हालात भी अच्छे नहीं कहे जा सकते। भय के वातावरण में न यादव रहने चाहिए और न ही गैर यादव।

इस चर्चित घटना की पृष्ठ भूमि में जायें, तो मृतका बड़ी लड़की के एक आरोपी पप्पू से प्रेम संबंध थे, जिसकी जानकारी अधिकाँश लोगों को है। वह छोटी चचेरी बहन के साथ पप्पू से अक्सर मिलने आती थी, जिसकी भनक लड़कियों के परिजनों को भी लग चुकी थी। पिछले मंगलवार 27 मई की रात को भी दोनों लड़कियां शौच के बहाने पप्पू से ही मिलने आई थीं। लड़कियों का एक चाचा कुछ देर बाद ही उनका पीछा करते हुए मौके पर पहुँच गया, वहां पप्पू मौजूद था, जिससे उसकी गाली-गलौच हुई और हाथापाई भी हुई, इस बीच वहां से लड़कियां घर की ओर भाग गईं। कुछ देर बाद वह चाचा अपने अन्य परिजनों के साथ पुलिस चौकी पहुंचा और लड़कियों के गायब होने की जानकारी देते हुए हत्या की आशंका व्यक्त की। पप्पू पर उन्होंने कई तरह के आरोप लगाये, तो मौके पर मौजूद सिपाही सर्वेश यादव और छत्रपाल आरोपी पप्पू के घर गये और पप्पू को साथ लाकर मृतका लड़कियों के परिजनों का आमना-सामना कराया। पप्पू के सामने आने पर कुछ देर पहले हुई घटना का खुलासा हो गया, जिससे पुलिस ने लड़कियों के परिजनों को यह कहते हुए डांट दिया कि प्रेम संबंधों की बात को छुपा कर अपहरण, दुष्कर्म और हत्या तक की आशंका व्यक्त क्यूं कर रहे हो, इसके बाद लड़कियों के परिजन पुलिस चौकी से चले गये, लेकिन सिपाहियों ने पप्पू को पुलिस चौकी में ही बैठा लिया। पुलिस सूत्र बताते हैं कि पप्पू ने अपने प्रेम संबंध से संबंधित घटनायें पुलिस चौकी में ही बैठ कर सिपाहियों को सुनाईं। चूँकि न मुकदमा दर्ज हुआ था और न ही पप्पू के पुलिस हिरासत में होने का कोई प्रमाण है, इसलिए पुलिस की इस कार्रवाई को कोई सच मानेगा भी नहीं, जबकि पुलिस ने इसके बाद पप्पू को छोड़ा ही नहीं और शाम को मुकदमा दर्ज होने के बाद जीडी में गिरफ्तार दर्शा दिया।

अगले दिन बुधवार की सुबह दोनों लड़कियों के शव गाँव के पास ही एक आम के पेड़ पर लटके मिले, जिसके बाद गाँव और क्षेत्र के सैकड़ों लोग मौके पर जमा हो गये। स्वजातीय और क्षेत्रीय प्रकरण होने के कारण कुछ देर बाद बसपा विधायक सिनोद कुमार शाक्य भी मौके पर पहुंच गये, वह भी परिजनों और भीड़ के साथ पेड़ से शव न उतारने के पक्ष में पुलिस से बहस करते रहे। एसपी सिटी मान सिंह चौहान और प्रभारी डीएम उदयराज सिंह मौके पर पहुंचे, तो लगभग चौदह घंटे बाद शव नीचे उतारे गये और परिजनों की जिद पर सिपाही सर्वेश यादव, सिपाही छत्रपाल, प्रेमी पप्पू और उसके दो अन्य भाई अवधेश व उर्वेश के विरुद्ध पुलिस को मुकदमा दर्ज करना पड़ा। पुलिस ने सिपाही सर्वेश और पप्पू को उसी दिन गिरफ्तार भी कर लिया, साथ ही दोनों सिपाहियों के साथ पुलिस चौकी पर तैनात पूरे स्टाफ को निलंबित भी कर दिया। यहाँ सवाल उठता है कि परिजनों की तहरीर के आधार पर ही कार्रवाई करते हुए पुलिस ने तत्काल सिपाही सहित दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया, तो पुलिस आरोपियों को बचा कैसे रही थी, इसके बावजूद अगले दिन परिजन सीबीआई जाँच की मांग करने लगे, तो प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच कराने की मांग भी तत्काल स्वीकार कर ली, लेकिन पीड़ित पक्ष ने किसी अफसर को प्रार्थना पत्र लिख कर नहीं दिया। पुलिस के अफसर प्रार्थना पत्र लेने गये, तो उन पर तरह-तरह के आरोप लगाने लगे। डीजीपी ए. एल. बनर्जी तीन जून की सुबह कटरा सआदतगंज आये और स्वयं परिजनों से प्रार्थना पत्र लिखवा कर ले गये, साथ ही सभी आरोपी जेल जा चुके हैं, जिससे सवाल उठ रहा है कि अब परिजन क्या चाहते हैं?

आरोपी पप्पू पुलिस के सामने प्रेम संबंध की बात स्वीकार कर चुका है, उसने प्रेम संबंध होने की बात मीडिया के सामने भी खुल कर कही, उसने यह भी बताया कि वह लगभग रोज मिलते थे और सेक्स भी करते थे, दोनों की मोबाइल पर लंबी बातचीत होती थी, जिससे सवाल यह भी उठता है कि सहमति से लगातार सेक्स कर रहा व्यक्ति बलात्कार क्यूं करेगा?

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण लटकना आया है, अर्थात लड़कियों की मौत सीधे लटकने से ही हुई है, उन्हें मार कर नहीं लटकाया गया। सुबह तक बड़ी लड़की के शव के साथ मोबाइल भी था, जो दोपहर बाद गायब हो गया, इस मोबाइल की कॉल डिटेल से बहुत कुछ साफ हो जायेगा। सवाल तो यह भी उठता है कि इतना सब होने के बाद मोबाइल लड़की के सीने में कैसे सुरक्षित रहा?

घटना पूरी तरह उलझी नज़र आ रही है। जांच एजेंसी को सब से पहले यह पता लगाना है कि आरोपी पप्पू के प्रेम संबंध थे या नहीं? मोबाइल कॉल डिटेल बात होने का प्रमाण आसानी से दे ही देगी। सवाल तो यह भी है कि तीन सगे भाई एक ही स्थान पर बलात्कार कैसे कर सकते हैं? मंगलवार की देर शाम को आरोपी पप्पू और लड़कियों के चाचा के बीच हाथापाई के दौरान लड़कियां घर की ओर भाग गईं, इसके बाद क्या हुआ? लड़कियाँ घर पहुँचीं या नहीं? घर पहुंच गईं, तो पेड़ पर कैसे लटक गईं? घर नहीं पहुँचीं, तो भी पेड़ पर कैसे लटक गईं? पेड़ पर स्वयं लटकी हैं या उन्हें किसी ने पेड़ पर लटक कर आत्महत्या करने को मजबूर किया था? दोनों के शव पेड़ पर अपने-अपने दुपट्टे में ही लटके हुए थे, जो बहुत कुछ स्वयं ही बयां कर रहे हैं, फिर भी इस अवस्था की कानूनी तौर पर विवेचना होना बहुत आवश्यक है। विवेचक को इस सबका खुलासा करने के लिए थोड़ा समय देना ही पड़ेगा, लेकिन घटना की पृष्ठ भूमि से पर्दा उठता, उससे पहले राजनेताओं ने पूरी घटना को जातीय और दलीय राजनीति का मुददा बना लिया। अब सरकार और पुलिस असंतुष्टों को संतुष्ट कर स्वयं का बचाव करने में जुटी है। घटना को लेकर प्रदेश सरकार पर दबाव बनाने की नीयत का खुलासा इस बात से होता है कि तथा-कथित पीड़ित पक्ष पिछड़े वर्ग का है, फिर भी केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू उत्तर प्रदेश सरकार से पत्र लिख कर यह पूछ रहे हैं कि आरोपियों के विरुद्ध अभी तक एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई क्यूं नहीं की गई।

घटना को लेकर पुलिस और सपा सरकार की भूमिका प्रशंसनीय बिल्कुल भी नहीं है, क्योंकि पुलिस ने मीडिया के दबाव में कार्रवाई शुरू की, वहीं प्रदेश सरकार विपक्षी नेताओं के दबाव के बाद हरकत में आई। इस घटना में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कार्रवाई करने का तरीका भी उन्हें घेरता जा रहा है। गृह सचिव को हटा दिया, पर संबंधित थाने का एसओ, एसएसपी, एसपी (सिटी), सीओ और डीएम आज तक नहीं हटाये, ऐसे में मीडिया और विपक्ष सवाल उठायेगा ही। इसी तरह भाजपा, बसपा और कांग्रेस के नेताओं की भूमिका पर भी तमाम सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी दलों को शोषण के विरुद्ध मिल कर आवाज उठानी चाहिए, पर इस तरह का भी दबाव नहीं बनाना चाहिए कि झूठ पर सच की और सच पर झूठ की परत चढ़ जाये। घटना का सही खुलासा करने के लिए विवेचक को समय देना चाहिए। हो सकता है कि विवेचना में आरोपी ही दोषी सिद्ध हो जायें। हो सकता है कि आरोपी कोई और हो। यह भी हो सकता है कि दोषी कोई भी न हो। कुल मिला कर कुछ भी हो सकता है। प्रतापगढ़ का चर्चित सीओ हत्या कांड और देश का चर्चित आरुषी कांड हमारे सामने नजीर है, इसलिए दलीय और जातीय राजनीति करने से नेता बाज आयें।

बी.पी. गौतम
बी.पी. गौतम

हाँ, इस घटना से अलग बात करें, तो दलीय और जातीय राजनीति का उत्तर प्रदेश गढ़ बना हुआ है। दलीय और जातीय राजनीति का सबसे बड़ा हथियार पुलिस ही बनती है। युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर दलीय और जातीय राजनीति से उत्तर प्रदेश को बाहर निकालने का विश्वास प्रदेश की जनता ने किया, तभी उन्हें विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिला, पर वह जनता की आशाओं पर खरे नहीं उतरे, जिसका परिणाम लोकसभा चुनाव में उन्हें मिल गया है, ऐसे में जनता एक बार फिर वही उम्मीद कर रही है कि अखिलेश यादव जाति, दल और धर्म से ऊपर उठ कर स्वच्छ शासन प्रदान करेंगे और उत्तर प्रदेश को विकास के पथ पर ले जायेंगे।      

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