सर जी, क्या टल्ली हो गए हो: सूर्यप्रताप सिंह

सार्वजनिक उद्यम विभाग के प्रमुख सचिव व तेजतर्रार आईएएस सूर्यप्रताप सिंह।
सार्वजनिक उद्यम विभाग के प्रमुख सचिव व तेजतर्रार आईएएस सूर्यप्रताप सिंह।

उत्तर प्रदेश सरकार की मुसीबतें कम नहीं हो पा रही हैं। एक ओर आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर का प्रकरण उबाल पर है, साथ में उच्च न्यायलय ने कुख्यात इंजीनियर यादव सिंह के प्रकरण में सीबीआई जाँच के आदेश जारी कर दिए हैं, वहीं सार्वजनिक उद्यम विभाग के प्रमुख सचिव व तेजतर्रार आईएएस अफसरों में से एक सूर्यप्रताप सिंह भी आग उगल रहे हैं। उन्होंने आज फिर अपनी फेसबुक वॉल पर खुल कर लिखा है।

वरिष्ठ आईएएस अफसर सूर्यप्रताप सिंह ने वॉल पर लिखा है, वह सब अक्षरशः निम्नलिखित है।

सुनो सर जी, मार डालो पर… डराओ मत, सर जी… !
आज एक समाचार छपा… “आईएएस सूर्य प्रताप सिंह को चार्जशीट दी गयी” बड़ा सामायिक है … पर भैया है कहाँ ये सब … क्या डरा-डरा कर मार डालोगे, सर जी। कोई भी विभागीय कारवाही गोपनीय होती है, यही जारी होने वाली नोटिस/चार्जशीट को जारी करने से पहले ही सम्बंधित विभाग द्वारा ‘लीक’ कर दिया जाता है, तो सम्पूर्ण कार्यवाही पूर्वाग्रह से ग्रसित मानी जाएगी। वह भी, किसी एक अखवार को exclusive खबर क्यों? प्रेस कांफ्रेंस या प्रेस नोट क्यों नहीं जारी कर देते, क्या अन्य अख़बारों से डर लगता है कि वे दोनों पक्ष का मत लेकर सच्चाई लिख देंगें? मैं ये सब सरल मन से पूछ रहा हूँ… कोई अहंकारवश नहीं।

इस प्रकार के पूर्वाग्रह ग्रस्त प्रचार क्या मानवीय संवेदना को कुचलने, मानसिक उत्पीड़न, और कलंकित करने का प्रयास तो नहीं है? ये सब गंभीर दर्द देता है, सर जी … पीड़ा देता है… जन भावनाओं से साथ खिलवाड़ होता है… भावनात्मक शोषण होता है। इस सब से कुछ ‘ना-समझ’ लोग (पार्टी कार्यकर्ता आदि ) अपने ‘आकाओं’ को खुश करने लिए ‘जन-वेदना ‘ को उठाने वाली आवाज को नष्ट भी कर सकतें है, मार भी सकते हैं … इतना तो ख्याल रखते, सर जी… ।

यह सब किसी व्यक्ति के प्रति जन-विश्वास को कम करने का प्रयास हो सकता है… फेसबुक पर लिखने वाले किसी लेखक की कलम तोड़ने का प्रयास हो सकता है… मेरे जैसे… एक छोटे-मोटे दीगर अधिकारी के… व्यक्तित्व व आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने का प्रयास मात्र हो सकता है… आदि आदि, मैं असली उददेश्य की परिकल्पना न कर पाने के कारण… केवल कयास ही लगा रहा हूँ।

मैं जनमानस की मौन स्वीकृति के वशीभूत उनके वर्तमान में विद्यमान व्यवस्था के डर, दर्द और यातना को एक जन-सेवक के रूप में उठा रहा हूँ, और वह भी जन-हित में। मैंने किसी व्यक्ति या संस्था की आलोचना के उदेश्य से निम्न मुद्दों को नहीं उठाया है। मैं सामान्यतः व्यक्तिगत आलोचना से बचता हूँ। मैंने अब तक निम्न मुख्य सार्वजनिक मुद्दे ‘जनहित’ में उठाये हैं :

1- प्रदेश में ‘बोर्ड परीक्षायों’ में व्याप्त ‘नक़ल’ का मुद्दा: “नकल रोको अभियान’ चलाया।
2- किसानों की इस वर्ष हुई ओलावृष्टि में रु. 7,500 करोड़ की अवितरित क्षति का मुददा, गत वर्ष सूखा राहत का रु. 450 करोड़ का वितरण नहीं तथा गन्ना किसानो का रु. 11, 000 करोड़ का लंबित भुगतान का मुददा आदि, सभी मुद्दे ‘किसान-हित’ व ‘जन-हित’ में उठाये गए।
3- प्रदेश में बिजली मूल्य में 70% जनविरोधी वृद्धि: बिजली विभाग में भ्रष्टाचार व वीआईपी जनपदों में बिजली चोरी की खुली छूट का मुद्दा उठाया।
4- लोक सेवा आयोग में अध्यक्ष अनिल यादव के भ्रष्टाचार, जातिवाद, कदाचार का मुद्दा तथा अन्य भर्ती आयोगों जैसे अधीनस्थ चयन आयोग, माध्यमिक चयन आयोग में एक ही जाति के अध्यक्ष व हो रही नियम विरुद्ध व्यापक भर्तियों के मुद्दे उठाये।
5- जगेन्द्र सिंह पत्रकार को सत्ता पक्ष के प्रभावशाली वर्ग द्वारा जलाकर मारने, व बाराबंकी में पत्रकार की माँ के साथ दरोगा द्वारा बलात्कार का प्रयास तथा जलाकर मारने का मुद्दा, जिनमें अभी तक कोई गिरफ्तारी/कार्रवाही नहीं हुई।
6- आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे (रु.15, 000) पर छ: “शक की सुईयां ” उठाई- जिसमें इस परियोजना केवल 4-5 जनपदों, एक वीआईपी गाँव व भू-माफिया/रियल एस्टेट एज़ेट्स के लाभार्थ उदेश्य को उजागार किया गया।

इससे पूर्व में भी 5, कालिदास पर मेरे जैसे ‘महत्वहीन’ विभाग की समीक्षा के बहाने बुलाकर मेरा अपमान भी किया गया। फ़ोन पर तो मुझे गाली-गलोच लगभग रोज ही दी जाती है। नक़ल रोको अभियान के दौरान एक वीआईपी जनपद तथा एक पूर्वी उ.प्र. के जनपद में मारने पीटने के उददेश्य से घेरा भी गया था। मेरे घर पर भी लोग भेजे गए। मैं इस सब को यद्यपि अति-गंभीरता से नहीं लेता हूँ… इसलिए नहीं कि… मैं बहुत निर्भीक हूँ… और न ही अहंकारवश… यह सब कह रहा हूँ… मैं अपने मन को समझाने के लिए… नियति पर भरोसा कर लेता हूँ… बस इतना ही मात्र है।

मैंने एक काल्पनिक पात्र विकसित किया है: ‘सर जी’ – यह मेरा स्वयं से बात करने (self-talking) का एक तरीका है… यह पात्र कोई व्यक्ति हो भी सकता है और नहीं भी…

उपरोक्त ‘गंभीर’ प्रकरण को लिखते हुए माहौल काफी ‘नीरस’ हो गया, जान पड़ता है। अतः नीचे संलग्न तीसरी फोटो को देखें… चलो हम सब मिलकर अपने ‘सर जी’ से पूंछते हैं… क्यों कर रहे हो ये सब… सर जी… क्या टल्ली हो गए हो?… टल्ली होना अच्छी बात नहीं… जनमानस की भावना… पीड़ा… दर्द… को गंभीरता से लेना चाहिए… यु… वाह… वा… वा… जोश के साथ होश हो, तो मजा आ जाये… बलात्कार… भ्रष्टाचार… जातिवाद… क्षेत्रवाद… झूठा प्रचारवाद… का फल …मीठा नहीं होता… गरीब… असहाय… निर्बल… को न सताईये जाकी मोटी हाय… बिना स्वांस की खाल से… लोह भस्म हो जाये…

मेरे लिखने व कहने का… उददेश्य जनमानस की भावनाओं को भड़काना कभी नहीं रहा… हाँ जनमानस को उनकी शक्ति का आभास कराने… जगाने का उदेश्य अवश्य रहा है… और यह मैं जब तक स्वांस है शायद… जरूर करूँगा… ऐसा संकल्प है… सर जी… गलती हो तो माफ कर देना।

उल्लेखनीय है कि इस पोस्ट के साथ सूर्यप्रताप सिंह ने तीन फोटो भी शेयर किये हैं, जिनमें एक बंदर शराब के नशे में दर्शाया गया है, जो सर जी का प्रतीक कहा जा सकता है।

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