चिन्मयानन्द और नित्यानंद का होना चाहिए बहिष्कार

– कुख्यात नित्यानंद को बनाया महामंडलेश्वर

शासन-प्रशासन की तरह ही संत समाज में भी आपराधिक प्रवृति के लोगों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और अपराध भी ऐसा कि मानवता ही शर्मसार हो जाए। चिन्मयानन्द और नित्यानंद जैसे दुष्कर्मियों को आम आदमी भी सम्मान नहीं देता, जबकि संत समाज इन्हें महिमा मंडित करता नज़र आ रहा है, जिससे समूचे संत समाज के प्रति लोगों की आस्था-श्रद्धा कम होनी स्वभाविक है।

चिन्मयानन्द
चिन्मयानन्द

संतों के प्रति लोगों की भावनाओं का दुरूपयोग कर एनडीए की सरकार में गृह राज्यमंत्री तक का सफ़र तय करने वाले चिन्मयानन्द पर बलात्कार का संगीन आरोप है, जो पुलिस की जांच में सिद्ध भी हो गया है, पर संत समाज ने चिन्मयानन्द का अभी तक बहिष्कार नहीं किया है, साथ ही पिछले दिनों एक शंकराचार्य चिन्मयानन्द के यहाँ एक कार्यक्रम में आरोप लगने के बाद भी सम्मलित हो चुके हैं, जिससे चिन्मयानन्द मुंह छिपाने की बजाये मस्त घूम रहा है, इसी तरह सेक्स स्कैंडल में फंसे नित्यानंद को महामंडलेश्वर की पदवी दे दी गई है, जबकि नित्यानंद के कुंभ में प्रवेश करने पर भी प्रतिबन्ध होना चाहिए था। हालांकि अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास नित्यानंद को महामंडलेश्वर बनाए जाने से भड़के गये हैं, लेकिन महानिर्वाणी अखाड़े के महंत रवींद्र पुरी का कहना है कि नित्यानंद पर जांच के बाद आरोप सिद्ध हुए, तो उनकी पदवी वापस ले ली जाएगी।

नित्यानंद
नित्यानंद

सवाल उठता है कि संत समाज में भी संतों को उपाधि अब पुलिस जांच के आधार पर दी जाया करेगी। परंपरा के आधार पर संतों को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए था, लेकिन कुंभ के दौरान संतों के विचार राजनीति को लेकर तो आते रहे, पर संत समाज में बढ़ रहे आपराधिक प्रवृति के लोगों के प्रभाव को लेकर कोई विशेष निर्णय नहीं लिया गया, जिससे आने वाले समय में आम आदमी संतों के नाम से ही घृणा करने लगे, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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