एडीएम (प्रशासन) व एडीएम (वित्त) ने जमा रखा है अवैध कब्जा

एडीएम (प्रशासन) व एडीएम (वित्त) ने जमा रखा है अवैध कब्जा
सिंचाई विभाग के इसी गेस्ट हाउस को एडीएम (प्रशासन) ने कार्यालय बना रखा है।
सिंचाई विभाग के इसी गेस्ट हाउस को एडीएम (प्रशासन) ने कार्यालय बना रखा है।

सरकारी सेवा में अपना कुछ नहीं होता। गाड़ी, बंगला और कार्यालय वगैरह सरकारी ही होते हैं, जो तबादले के साथ ही छूट जाते हैं, लेकिन कुछ अफसर इस सबको स्वयं के अहंकार से जोड़ कर देखते हैं। शक्तिशाली पद पर तैनात हों, तो दबंगई भी दिखाते हैं। बदायूं में अपर जिला अधिकारी (प्रशासन) और अपर जिला अधिकारी (वित्त) ने अन्य विभागों की संपत्ति पर कब्जा जमा रखा है, जिससे संबंधित विभागों के अफसरों को ही नहीं, बल्कि आम आदमी को भी परेशानी हो रही है, पर वरिष्ठ प्रशानिक अफसरों के सामने किसी का भी मुंह खोलने का साहस नहीं है।

पिछली सपा सरकार में मुलायम सिंह यादव ने कलेक्ट्रेट भवन के निर्माण की मंजूरी दी थी। विधान भवन के नक्शे पर आधारित यूपी का नंबर- वन भवन बना है। निर्माण के लिए पुराने भवन तोड़े गये, तो अफसरों को इधर-उधर बैठाया गया। अपर जिला अधिकारी (वित्त) को सूचना भवन में बैठाया गया और अपर जिला अधिकारी (प्रशासन) को सिंचाई विभाग के गेस्ट हाउस में बैठा दिया गया। अब कलेक्ट्रेट भवन का निर्माण हो चुका है। जिलाधिकारी दो वर्ष से नये भवन में ही बैठ रहे हैं, लेकिन दोनों एडीएम नये भवन में नहीं जा रहे, जिससे अन्य लोगों को समस्या हो रही है। असलियत में नवीन भवन में जिलाधिकारी सबसे बड़े अफसर हैं, जिससे छोटे अफसरों की शक्ति दब जाती है, इसलिए एडीएम अलग ही बैठे रहना चाहते हैं।

सूचना भवन के सामने एडीएम (वित्त) की गाड़ी खड़ी होती है और सूचना विभाग की गाड़ी दूर खड़ी नजर आ रही है।
सूचना भवन के सामने एडीएम (वित्त) की गाड़ी खड़ी होती है और सूचना विभाग की गाड़ी दूर खड़ी नजर आ रही है।

सूचना विभाग में उप निदेशक नहीं है। कार्यभार एडीएम के पास ही रहता है, ऐसे में सूचना विभाग के अफसर एडीएम के अधीन हैं, जो चुप ही रहेंगे, इसी तरह गेस्ट हाउस सिंचाई विभाग का है, जिसमें एडीएम (प्रशासन) बैठते हैं, जो सिंचाई विभाग के अभियंता से बड़े हैं, इसलिए अभियंता का भी साहस नहीं है, सो कब्जा चला आ रहा है, जबकि नवीन भवन बनते ही दोनों एडीएम को स्वयं ही नये कार्यालय में चले जाना चाहिए था। सूत्रों का यह भी कहना है कि एडीएम (वित्त) के कार्यालय के बाबू शातिर हैं, जो अलग ही बैठे रहना चाहते हैं और अपने बाबुओं के ही बहकावे में एडीएम भी आ जाते हैं।

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