राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के सम्मेलन का शुभारंभ

राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के सम्मेलन का शुभारंभ
  • समाज के दबे-कुचले एवं साधनविहीन वर्गों को विभिन्न स्तरों पर मुफ्त विधिक सेवाएं उपलब्ध कराना हमारा दायित्व है :   न्यायमूर्ति पी. सथाशिवम
 
  • सुनिशिचत करना होगा कि गरीबों को नि:शुल्क विधिक सेवाएं मिलें और वे न्याय से वंचित न रहें : मुख्यमंत्री
 
 
  • लखनऊ में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के 12वें दो दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन का शुभारम्भ 
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के 12वें दो दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन का लखनऊ में शुभारंभ करते भारत के मुख्य न्यायाधीश व मुख्यमंत्री
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के 12वें दो दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन का लखनऊ में शुभारंभ करते भारत के मुख्य न्यायाधीश व मुख्यमंत्री
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. सथाशिवम ने लखनऊ में आज संविधान में निहित प्राविधानों का उल्लेख करते हुए नि:शुल्क विधिक सेवा उपलब्ध कराने हेतु अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी तथा कहा कि नि:शुल्क विधिक सहायता के माध्यम से लोकतंत्र को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि लखनऊ के इस सम्मेलन में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सुविधा प्रदान करने पर विस्तार से विचार किया जायेगा। उन्होंने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि इस सम्बन्ध में सभी सम्बनिधत संस्थाओं द्वारा पर्याप्त प्रयास किये गये हैं। न्याय प्रदान किये जाने हेतु सभी सम्बनिधत स्टेक होल्डर को महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी है तथा यह कार्य संविधान में निहित भावना के अनुरूप तहसील से लेकर उच्चतम न्यायालय तक किया जाना है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. सथाशिवम ने यह बात आज लखनऊ के गोमतीनगर सिथत इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के 12वें अखिल भारतीय सम्मेलन के उदघाटन अवसर पर कही। उन्होंने सम्मेलन का उदघाटन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वार्इ. चन्द्रचूड़ के साथ दीप प्रज्ज्वलन कर किया।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोक अदालत में पीठासीन अधिकारियों का योगदान महत्वपूर्ण है तथा उन्हें सुलह समझौते के आधार पर वादों का निस्तारण करना चाहिए तथा सुलह के दौरान सभी पक्षों को समान अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। इस अवसर पर उन्होंने नवम्बर, 2013 में राष्ट्रीय लोक अदालत की सफलता का उल्लेख किया तथा कहा कि इस लोक अदालत के माध्यम से 71 लाख से अधिक वादों का निस्तारण किया गया है तथा परिवारिक वादों के सम्बन्ध में भी इस तरह की लोक अदालतों के आयोजन की आवश्यकता है। उन्होंने विधिक सेवाओं को समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचाये जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि मुख्य एजेन्डा यह होना चाहिए कि विधिक सहायता उन वर्गों तक पहुंचार्इ जाये, जो न्याय के दरवाजे तक नहीं पंहुच सकते हैं। मीडिया, सामाजिक संगठनकार्यकर्ता तथा अधिवक्ताओं को इसके सम्बन्ध में संविधान की भावना के तहत सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए। विधिक सेवा कोर्इ दान नहीं है, बल्कि यह लोगों का अधिकार है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को विधिक साक्षारता शिविर ऐसे स्थानों पर जहां झुग्गी-झोपड़ी हों, मजदूरों की कालोनी हो तथा पिछड़े क्षेत्रों में आयोजित कराना चाहिए, जिससे कि लोग अपने विधिक अधिकारों तथा नि:शुल्क विधिक सेवा के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने विधिक जानकारी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज में इसके प्रति जागरूकता बढ़ने से बुराइयों को दूर करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय इलाहाबाद में जजों की स्वीकृत संख्या 160 है, किन्तु वर्तमान में कुल संख्या सिर्फ 91 है। आधारभूत सुविधाओं की कमी के कारण राज्य में नि:शुल्क विधिक सहायता जैसा की संविधान में अपेक्षित है, उपलब्ध नहीं हो पा रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इस बात पर भी जोर दिया गया कि न्यायपालिका के समक्ष आाधारभूत सुविधाओं की कमी तथा स्टाफ की भी कमी है, जिसके कारण न्याय प्रदान किये जाने में असुविधा होती है तथा न्याय का उददेश्य नहीं प्राप्त हो पाता है। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या का 25 प्रतिशत और बढ़ाये जाने की अपेक्षा की गर्इ।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में शिरकत करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सामाजिक न्याय के महत्व तथा विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला और समाज के गरीबों, अनपढ़ तथा अन्य पिछड़े वर्गों को नि:शुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि हमें सुनिशिचत करना होगा कि गरीबों को नि:शुल्क विधिक सेवायें मिलें और वे न्याय से वंचित न रहें।
 श्री यादव ने हाल ही में सम्पन्न राष्ट्रीय लोक अदालत की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि 12 अप्रैल, 2014 में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय लोक अदालत को सफल बनाने के लिए सभी विभागों को आवश्यक निर्देश दे दिये गये हैं। उन्होंने बताया कि इस लोक अदालत की सफलता के लिए प्रत्येक विभाग में नोडल अधिकारी नामित करने का निर्देश दिए गए हैं, जबकि राज्य स्तर पर प्रमुख सचिव न्याय को नोडल अधिकारी नामित किया जा चुका है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि समाज के अनितम व्यकित को जटिल न्यायिक प्रक्रिया से उबारते हुए सुलभ न्याय दिलाना हम सबके लिए एक चुनौती है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि हम सभी अपने गुरूतर दायित्व का निर्वहन करते हुए प्रत्येक विधिक सेवा संस्थान पर प्रभावी पर्यवेक्षण सुनिशिचत करेंगे तथा सभी के सकारात्मक प्रयास से इस लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण एवं उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रख्यापित विधिक योजनाओं के सम्यक क्रियान्वयन में हर संभव सहयोग दिया जाएगा और समस्त योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु किए जाने वाले प्रयासों में कोर्इ कमी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि हमें वंचित वर्गों में नि:शुल्क कानूनी सेवाओं के प्रति जागरूकता उत्पन्न करनी होगी। उनहोंने इस अवसर पर पधारे सभी न्यायाधीशगण का स्वागत भी किया।
इस अवसर पर गेस्ट आफ आनर उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश व राष्ट्रीय विधिक सेवा के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा ने कहा कि इस तरह का पहला सम्मेलन 1998 में नर्इ दिल्ली में आयोजित किया गया था तथा वर्तमान सम्मेलन 08 मार्च, ”महिला दिवस पर यहां आयोजित किया गया है, उत्तर प्रदेश जनसंख्या में सबसे बड़ा राज्य है। उन्होने इस सम्मेलन को आयोजित करने हेतु आभार व्यक्त किया तथा संविधान में उलिलखित न्याय की मूल भावना पर जोर देते हुए कहा कि यह हमारा कर्तव्य है कि कोर्इ भी व्यकित अन्याय का शिकार न हो। उन्होंने इस अवसर पर लंबित मुकदमों की संख्या को कम करने हेतु प्रीलिटिगेशन पर जोर दिया। लोक अदालत तथा मीडिएशन द्वारा अच्छा कार्य किया जा रहा है किन्तु प्रीलिटिगेशन सुलह को अपनाये जाने की आवश्यकता है तथा इस कार्य में सभी भागीदारों को जागरूक किये जाने की आवश्कता है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रतिपादित उददेश्यों को लागू करने में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को और कार्य करना होगा। उन्होंने इस अवसर पर यह भी बल दिया कि विधिक साक्षारता समाज के कमजोर लोगों को उपलब्ध कराना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस अवसर पर उन्होंने ग्राम स्तरीय केयर और सहयोगी केन्द्र के उदघाटन के बारे में अपने अनुभवों से अवगत कराया तथा इन केन्द्रों को बढ़ाये जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह भी कहा कि न्याय को समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचाये जाने की आवश्यकता है।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक ने अपने की-नोट एड्रेस में संविधान की प्रस्तावना तथा अनुच्छेद 39ए पर बल दिया तथा कहा कि इसके माध्यम से राज्यों को न्याय के उददेश्य हेतु कार्य करना चाहिए तथा यह सुनिशिचत करना चाहिए कि न्याय की प्रापित हेतु किसी भी आर्थिक व सामाजिक वर्ग के अधिकारों को न छोड़ा जाये। न्यायमूर्ति द्वारा यह भी कहा गया कि नि:शुल्क विधिक सहायता के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी न होने के कारण भी लोगों को इसका फायदा नहीं मिल पाता है। अत: लोगों को जागरूक किये जाने की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि उचित एवं योग्य व्यकितयों की सहायता से विधिक सहायता उपलब्ध करार्इ जानी चाहिए। इस अवसर पर माननीय न्यायमूर्ति द्वारा अन्य विकल्पों, जिनके माध्यम से वादों का त्वरित निस्तारण हो सकता है, पर जोर दिया तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता में उल्लखित प्री-बारगेनिंग स्कीम पर बल दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय इलाहाबाद न्यायमूर्ति डा. धनन्जय यशवंत चन्द्रचूड़ ने अपने स्वागत भाषण में लोक अदालत द्वारा निर्णीत वादों तथा विधिक साक्षरता शिविर तथा क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का विवरण प्रस्तुत करते हुए उच्च न्यायालय इलाहाबाद तथा खण्ड पीठ लखनऊ में दायर तथा निर्णित वादों का विवरण भी प्रस्तुत किया।  उन्होंने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा किये गये कार्यों की प्रशंसा करते हुए अन्य न्यायिक सहभागीदारों की भूमिका पर जोर दिया, ताकि कानून का शासन स्थापित हो तथा सभी को विधिक सहायता प्रदान की जा सके। उन्होंने अवस्थापनागत समस्याओं के हल पर जोर दिया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुनील अम्बवानी ने अतिथिगण का स्वागत करते हुए इस बात पर जोर दिया कि संविधान की भावना के अनुरूप सभी जरूरतमंदों को सुलभ न्याय उपलब्ध कराया जाये। उन्होंने इस अवसर पर उ0प्र0 विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा किये गये कार्यों का विशेष रूप से उल्लेख किया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के वरिष्ठ न्यायाधीश उमा नाथ सिहं द्वारा अतिथिगण का धन्यवाद ज्ञापित किया गया। उदघाटन कार्यक्रम का संचालन श्री राजीव महेश्वरम, उप सचिव, उ0प्र0 विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ द्वारा किया गया।
दिनांक 08 व 09 मार्च, 2014 को आयोजित होने वाले 12वें अखिल भारतीय सम्मेलन का उददेश्य, विस्तृत चर्चा के आधार पर आमजन को विधिक सेवा संस्थाओं के माध्यम से किस प्रकार से अधिक से अधिक नि:शुल्क विधिक प्रसुविधाओं की अनुमन्यता सुनिशिचत हो सके, के सम्बन्ध में नीतिगत विनिश्चयन करना है। इसके अतिरिक्त उक्त कार्यक्रम में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र में वर्ष 2014-15 मे नालसा द्वारा कि्रयानिवत करायी जाने वाली योजनाओं की रूपरेखा तैयार की जायेगी। नालसा की केन्द्रीय प्राधिकरण की बैठक भी होगी। उत्तर प्रदेश के समस्त जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के अध्यक्ष जिला न्यायाधीश एवं सचिवसिविल जज (सीनियर डिवीजन) प्रत्यक्ष रूप से प्लेनरी सेशन में समस्त राज्य विधिक सेवा प्राधिकराणों के कार्यपालक अध्यक्षगण एवं सदस्य सचिवगण से रूबरू होंगे तथा जमीनी स्तर पर विधमान अवरोधों, आधारभूत संरचना, विधिक सेवा संस्थाओं द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों को लागूू कराने में उत्पन्न भौतिक व वित्तीय पहलुओं के बारे में भी अवगत करायेंगे। किस प्रकार से विधिक सेवा कार्यक्रमों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके, इस सम्बन्ध में आवश्यक विचार-विमर्श किया जाएगा।
कार्यक्रम के दौरान मुख्य सचिव जावेद उस्मानी, कृषि उत्पादन आयुक्त आलोक रंजन, प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री राकेश गर्ग, प्रमुख सचिव न्याय एस.के. पाण्डेय, प्रमुख सचिव गृह अनिल कुमार गुप्ता, प्रमुख सचिव नियुकित एवं कार्मिक राजीव कुमार, प्रमुख सचिव राजस्व के.एस. अटोरिया, सूचना निदेशक प्रभात मित्तल के अतिरिक्त शासन-प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी उपसिथत थे।

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