मौत का कुआँ

मौत का कुआँ
  •  28 जनवरी 2००6 को इंदौर में तीन साल का दीपक 22 फीट गहरे गड्ढे में गिर गया।
  • 23 जुलाई 2००6 को हरियाणा में प्रिंस नाम का बच्चा बोरवेल में गिर गया जिसे काफी मशक्ककत के बाद बचाने में कामयाबी मिली थी।
  •  2 जनवरी 2००7 को झांसी के पास एक गांव में 3० फुट गहरे गड्ढे में ढ़ाई साल का एक बच्चा गिर गया।
  • 4 फरवरी 2००7 को मध्य प्रदेश के कटनी जिले में तीन साल का एक मासूम 6० फीट गहरे गड्ढे में गिर गया।
  • 9 अक्टूबर 2००8 को आगरा के पास लहरापुर में 65 फीट के बोरवेल में दो साल का बच्चा गिर गया।
  • 9 नवंबर 2००8 को कन्नौज में भगरवाड़ा गांव में 6० फुट गहरे बोरवेल में 5 साल का बच्चा गिर गया।
  • 21 जून 2००9 को राजस्थान के दौसा में 2०० फीट गहरे एक बोरवेल में चार साल की बच्ची गिर गई।
  • 17 सितंबर, 2००9 को गुजरात के साबरकांठा जिले में ग्यारह साल का एक बच्चा बोरवेल में गिर गया।
  • 8 नवंबर 2००9 को राजस्थान के जयपुर जिले के शाहपुरा थाना क्षेत्र के जगतपुरा गांव चार वर्षीय साहिल बोरवेल में गिर गया।
  • 15 दिसंबर 2००9 मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले में एक ढाई साल का बालक अंकित मंगलवार को 2०० फुट से अधिक गहरे बोरवेल में गिर गया।
  •  19 जनवरी 2०1० को आंध्रप्रदेश के एक गाँव में 3० फीट गहरे बोरवेल में गिरकर एक डेढ़ वर्षीय बच्चा मर गया।
  • 29 जनवरी 2०1० को राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के जहाजपुर गांव का साढ़े चार साल का मासूम पंकज 25० फीट गहरे बोरवेल में गिर गया।
  • 13 नवंबर 2०11 को यूपी के फिरोजाबाद में एक 6 साल का बच्चा गहरे बोरवेल में गिर गया।
  •  8 दिसंबर 2०11 को गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले में 2 साल का बच्चा शाम 4०० फुट गहरे बोरवेल में गिर गया।
  • 21 जून 2०12 को गुडग़ांव की माही बोरवेल में गिर गयी।
  • 1 जुलाई 2०12 को गुडगांव के पालम विहार के पास दो साल का सचिन 2० फीट गहरे गड्ढे में गिर गया।

आपको बताना चाहूंगी कि, मेरी पूरी मेहनत के बाद भी यह सूची अधूरी है। इसमें बहुत से ऐसे बच्चे नहीं हैं जिन पर मीडिया की कृपा नहीं हुई। कुछ समय के अंतराल पर आने वाली इन घटनाओं को हम बहुत जल्दी ही भूल जाते हैं। जब तक चैनल ऐसी कोई खबर दिखाता रहता है तब तक हम सभी उसे किसी क्रिकेट मैच की तरह देखते हैं। बच्चा बच जाता है तो राहत की सांस लेते हुए वॉक पर चल देते हैं और यदि दुर्भाग्य से नहीं बचा तो च च च च….. करते हुए भी वॉक पर ही चल देते हैं। खबर देखते हुए कभी यह महसूस नहीं होता कि जो बच्चे मरे हैं वे दूसरे ग्रह के प्राणी नहीं हैं। वे भी हमारे जैसे ही परिवारों के बच्चे हैं। यह घटना किसी के भी घर में घट सकती है। गड्ढे वाली सडक़ें, बिजली की नंगी तारें और खुले बोरवेल इस देश का अभिन्न अंग बन चुके हैं। ऐसे में क्या इन मासूमों को जिनमें से किसी की उम्र आठ साथ से अधिक नहीं, मरने के लिए छोड़ दिया जाए? जिन बोरवेल में ये बच्चे गिरकर मरे क्या वे उसी दिन खोदे गए थे? जहां तक मैं जानती हूँ ये मौत के कुएं महीनों खुले पड़े रहते हैं और इन पर कोई ध्यान नहीं देता। आते-जाते क्या कभी किसी ने सोचा कि उस पर एक बड़ा सा पत्थर रखकर ढँक दें? जब तक अपने साथ ऐसी कोई घटना न घट जाये तब तक व्यक्ति यही सोचता है कि उसके पूरे परिवार ने अमृत पीया है और उन्हें कुछ नहीं होगा। ऐसी कोई भी घटना होते ही सब एक स्वर से प्रशासन को कोसने लगते हैं। प्रशासन तो जैसा है वैसा है, आज से नहीं है, शुरू से ही है। यदि कहा जाये कि यह देश राम भरोसे चल रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। विचारणीय बात यह है कि हम कैसे हैं? हम कैसे नागरिक हैं? हम कैसे पड़ोसी हैं? और क्षमा कीजिये, हम कैसे माँ-बाप हैं? बच्चे के जाने का दुख माता-पिता से अधिक किसी को नहीं होता। हम सभी को उनसे सहानुभूति है और वे इसके अधिकारी भी हैं, पर इस जिम्मेदारी से बरी वे भी नहीं। घर में बच्चा हो तो व्यक्ति जहरीले पदार्थ उसकी पहुँच से दूर रखता है, बिजली के सॉकेट ऊंचाई पर लगवाता है। हर प्रकार से उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। एक साल, दो साल, तीन साल का बच्चा माँ की आँख से जऱा देर को ओझल हो जाए तो वह बेचैन हो उठती है। ऐसे में बच्चे का घर से बाहर तक चले जाना और बोरवेल में गिर जाना कहीं न कहीं लापरवाही का ही संकेत है। बच्चे इंसान अपनी जि़म्मेदारी पर पैदा करता है, प्रशासन की नहीं। खैर! बच्चों की मृत्यु एक ऐसा संताप है जिसमें हर व्यक्ति एक कारण सा ही दिखता है। तमाम जिम्मेदारियाँ तय करने के बाद भी यह सवाल अबूझ ही है कि मासूमों की मौत का कारण बन रहे यह मौत के कुएं कब तक सुरसा की तरह मुंह फाड़े रहेंगे? आखिर कब तक ये मासूम, भोले चेहरे मिट्टी के ढेर में गुम होते रहेंगे?

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