मुख्यमंत्री ने गौरैया को लुप्त होने से बचाने की अपील की

मुख्यमंत्री ने गौरैया को लुप्त होने से बचाने की अपील की
 
  • पर्यावरण संरक्षण में गौरैया के महत्व तथा इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जनजागरूकता उत्पन्न करने के इरादे से 20 मार्च को आयोजित होता है ‘विश्व गौरैया दिवस’
मुख्यमंत्री ने गौरैया को लुप्त होने से बचाने की अपील की
मुख्यमंत्री ने गौरैया को लुप्त होने से बचाने की अपील की
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य की जनता से गौरैया को लुप्त होने से बचाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अपील की है। उन्होंने गौरैया के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु वन विभाग से प्रदेश स्तर पर अभियान चलाने के लिए कहा है। प्रकृति ने सभी वनस्पतियों और प्राणियों के लिए विशिष्ट भूमिका निर्धारित की है। इसलिए पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं को पूरा संरक्षण प्रदान किया जाए।
एक-दो दशक पहले हमारे घर-आंगन में फुदकने वाली गौरैया आज विलुप्ति के कगार पर है। इस नन्हें से परिंदे को बचाने के लिए प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस के रूप में मनाया जाता है। पर्यावरण संरक्षण में गौरैया के महत्व व भूमिका के प्रति लोगों का ध्यान आकृष्ट करने तथा इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जनजागरूकता उत्पन्न करने के इरादे से यह आयोजन किया जाता है। यह दिवस पहली बार वर्ष 2010 में मनाया गया था।
भारत में गौरैया की संख्या घटती ही जा रही है। कुछ वर्षों पहले आसानी से दिख जाने वाला यह पक्षी अब तेजी से विलुप्त हो रही है। वैसे गौरैया की इस हालत के जिम्मेदार हम मानव ही हैं। हमने तरक्की तो बहुत की, लेकिन इस नन्हें पक्षी की तरक्की की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि जो दिवस हमें खुशी के रूप में मनाना चाहिए था, वो हम आज इसलिए मनाते हैं कि इनका अस्तित्व बचा रहे।
बात बहुत अधिक पुरानी नहीं है, जब बस्तियों में छप्पर वाले घर होते थे, जिनमें रोशनदान व झरोखे होते थे। गौरैया तिनका-तिनका बटोरकर इन स्थानों पर अपना ठिकाना बनाती थी। चुगने के लिए अनाज के दाने घर की रसोई, बरामदे व छत पर सुखाने के लिए फैलाए गए अनाज व खेत-खलिहान से भी मिल जाते थे।
जमाना बदला तो छप्पर के स्थान पर सीमेंट की छत आ गयी। आवासों की बनावट ऐसी कि गौरैया के लिए घोंसला बनाना मुश्किल। एयरकंडीशनरों ने रोशनदान तो क्या खिड़कियां तक बन्द करवा दीं। गौरैया ग्रामीण परिवेश का प्रमुख पक्षी है, किन्तु गाँवों में फसलों को कीटों से बचाने के लिए कीटनाशकों के प्रयोग के कारण गाँवों में गौरैया की संख्या में कमी हो रही है।
गौरैया के संरक्षण में हमारी भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। आवास की छत, बरामदे अथवा किसी खुले स्थान पर बाजरा या टूटे चावल डालने व उथले पात्र में जल रखने पर गौरैया को भोजन व पीने का जल मिलने के साथ-साथ स्नान हेतु जल भी उपलब्ध हो जाता है। बाजार से नेस्ट हाउस खरीद कर लटकाने अथवा आवास में बरामदे में एक कोने में जूते के डिब्बे के बीच लगभग चार से.मी. व्यास का छेद कर लटकाने पर गौरैया इनमें अपना घोंसला बना लेती है।
सिर्फ एक दिन नहीं हमें हर दिन जतन करना होगा गौरैया को बचाने के लिए। गौरैया महज एक पक्षी नहीं है, ये हमारे जीवन का अभिन्न अंग भी रहा है। बस इनके लिए हमें थोड़ी मेहनत रोज करनी होगी। छत पर किसी खुली छावदार जगह पर कटोरी या किसी मिट्टी के बर्तन में इनके लिए चावल और पीने के लिए साफ बर्तन में पानी रखना होगा। फिर देखिये रूठा दोस्त कैसे वापस आता है।

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