पुलिस की लाचारी से अविश्वास प्रस्ताव पर निर्णय टला

पुलिस की लाचारी से अविश्वास प्रस्ताव पर निर्णय टला

– अब 22 मार्च को होगा जिला पंचायत की कुर्सी का निर्णय

जिला पंचायत कार्यालय के सामने खड़ीं पूनम यादव व जितेन्द्र यादव
जिला पंचायत कार्यालय के सामने खड़ीं पूनम यादव व जितेन्द्र यादव

पुलिस की बेबसी के चलते आज अविश्वास प्रस्ताव पर निर्णय नहीं हो सका। अपर जिला जज की निगरानी में होने वाले चुनाव का निर्णय अब 22 मार्च को होगा, जिससे सत्ता पक्ष की जमकर फजीहत हो रही है।

कुख्यात बाहुबली और धनबली डीपी यादव के साले की पत्नी पूनम यादव बदायूं की जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। बसपा की सरकार में डीपी ने सत्ता का खुला दुरूपयोग कर पूनम यादव को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया था। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष चेतना सिंह और उनके पति नरेश प्रताप सिंह सक्रिय हुए, तो सदस्यों को एकजुट कर उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव लाने का आवेदन दे दिया, जिस पर डीएम ने आज 26 फरवरी को चुनाव कराने की तिथि निश्चित की थी। अपर जिला जज की निगरानी में चुनाव होना था, लेकिन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने पत्र के माध्यम से सूचित कराया कि 12 जिला पंचायत सदस्यों का अपहरण कर लिया गया है एवं इलाहाबाद कुंभ में पुलिस जाने के कारण सदस्यों को बरामद करने में परेशानी आ रही है। एसएसपी के पत्र के आधार पर अपर जिला जज ने चुनाव की तिथि आगे बढ़ाते हुए 22 मार्च का दिन निश्चित कर दिया।

उधर पूनम यादव डीपी के भतीजे एमएलसी जितेन्द्र यादव के साथ दिखाई दीं एवं चेतना सिंह भी आईं, लेकिन तिथि आगे बढ़ने के बाद चली गईं। इधर तिथि आगे बढ़ने से आम जनता के बीच यही सन्देश गया है कि पूनम यादव सत्ता पर भारी हैं। मुख्य रूप से सांसद धर्मेन्द्र यादव की पकड़ कमजोर होने का सन्देश गया है, क्योंकि वह चेतना सिंह के साथ हैं। सूत्रों का कहना है कि सांसद धर्मेन्द्र यादव के साथ पार्टी हाईकमान भी चेतना के साथ है, इसके बावजूद कुछ स्थानीय सपा नेता पर्दे के पीछे से पूनम यादव की मदद कर रहे हैं, तभी पूनम यादव भारी हैं, इससे आम जनता के बीच यही सन्देश जा रहा है कि स्थानीय सपा नेता सांसद धर्मेन्द्र यादव पर भी हावी हैं। यह सन्देश जाने से सांसद की आम जनता के बीच पकड़ कमजोर होना स्वभाविक ही है। सांसद अपनी इज्जत बचाने के लिए क्या करते हैं, यह तो अब भविष्य में ही पता चलेगा।

कुर्सी न मिले, तो भी चेतना जीत गईं 

जिला पंचायत की कुर्सी पर चेतना सिंह का कब्जा हो गया, तब तो उनकी जीत है ही और वह कब्जा नहीं कर पाईं, तो भी उनकी जीत ही है, क्योंकि उन्हें जो सन्देश देना था, वह सन्देश आम जनता के साथ पार्टी हाईकमान तक चला गया है। बसपा सरकार में हुए चुनाव में डीपी पूरे तन्त्र पर हावी थे, उनके सामने किसी की नहीं चली, साथ ही चेतना विरोधी सपाई उस समय भी पूनम यादव के साथ थे। चेतना विरोधियों ने उस समय डबल गेम खेला। चेतना को कुर्सी विहीन करने के साथ यह अफवाह भी फैला दी कि चेतना सिंह ने पूनम यादव को समर्थन दे दिया, जिससे सपा से उन्हें निष्काशित करा दिया। हालांकि बाद में उनकी पार्टी में वापसी हो गई। अब वही डबल गेम वह खेल रही हैं। कुर्सी मिल गई, तो भी जीत और हार गईं, तो हार उनकी नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी और सांसद धर्मेन्द्र यादव की होगी, जिससे उनके विरोधियों के नंबर कम होना निश्चित ही है। चेतना के ऊपर पूनम यादव से मिलने का जो धब्बा लगा था, वह अब धुल चुका है।

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