दुर्भाग्य नहीं, बल्कि अव्यवस्था ने ली नन्हें मुश्ताक की बलि

दुर्भाग्य नहीं, बल्कि अव्यवस्था ने ली नन्हें मुश्ताक की बलि
  • डीएम-एसपी को सड़क हादसों से कोई मतलब नहीं रहता
मुश्ताक की एक टांग बिल्कुल अलग हो गई और लटकती रह गई, इसके बावजूद वह रोया नहीं, पर खून की कमी के चलते वह यमराज से नहीं लड़ पाया।
मुश्ताक की एक टांग बिल्कुल अलग हो गई और लटकती रह गई, इसके बावजूद वह रोया नहीं, पर खून की कमी के चलते वह यमराज से नहीं लड़ पाया।

जिला बदायूं की सड़कों पर यमराज वर्षों से तांडव कर रहे हैं। हादसों के लिए कुख्यात हो चुके बदायूं में हर दिन एक-दो जान चली जाती है, लेकिन हादसे जघन्य अपराध की श्रेणी में नहीं आते। हादसे कम या ज्यादा होने से पुलिस ऑफिसर के नंबर कम या ज्यादा नहीं होते। प्रशासनिक अफसरों को भी कोई मतलब नहीं है, साथ ही आम जनता भी हादसों के लिए भ्रष्ट और लापरवाह तंत्र को जिम्मेदार नहीं मानती, इस सब के अलावा स्वयं सेवी संस्थायें व राजनैतिक दलों से जुड़े नेता भी कभी इस मुददे को नहीं उठाते, इसलिए यमराज का तांडव निरंतर जारी है, जबकि पुलिस और प्रशासन की सक्रियता से नब्बे प्रतिशत हादसे कम हो सकते हैं।

मंगलवार की दोपहर में नबादा तिराहे से आगे बरेली हाई-वे के किनारे टैंपो चालक बिनावर थाना क्षेत्र के गाँव कान्हा नगला निवासी मुश्ताक आराम करने के लिए खड़ा हो गया। सड़क से काफी दूर पटरी पर खड़ा था। मुश्ताक का दस वर्षीय छोटा भाई आफताब परिचालक की तरह भाई का हाथ बंटाता है। वह बाहर को पैर लटकाये बैठा, तभी सौ की स्पीड से दौड़ती हुई एक डग्गामार गाड़ी आई और कट मारते हुए टैंपो से चिपक कर निकल गई। आसपास खड़े लोगों को ही नहीं, बल्कि खुद मुश्ताक को काफी देर बाद अहसास हुआ कि उसकी दोनों टाँगे गायब हो चुकी हैं। सब कुछ इतनी तेज़ी से हुआ कि किसी ने गाड़ी का नंबर तक नहीं देखा। इसके बाद आफताब किसी तरह भाई को लेकर जिला अस्पताल पहुंचा, यहाँ इमरजेंसी में उसका उपचार शुरू हो गया, लेकिन दोनों टाँगे कटने के कारण उसका बहुत खून बह चुका था। जांच के बाद जिला अस्पताल के ब्लड बैंक से खून माँगा गया, तो पता चला कि ए निगेटिव ग्रुप का खून है ही नहीं और खून की कमी के चलते बच्चा तड़प-तड़प कर मर गया।

उक्त घटना में कुछ भी असामान्य नहीं लगता। लगता है कि सब संयोग और दुर्भाग्य से हुआ, लेकिन ऐसा नहीं है। सब से पहले तो बरेली-बदायूं हाई-वे पर चलने वाले डग्गामार वाहनों की बात करते हैं। यह मार्ग बरेली के सुभाष नगर, भमोरा और बदायूं के सिविल लाइन और बिनावर थानों की सीमा में गुजरता है। दोनों जिलों में दबंग लोग डग्गामार वाहनों से उगाही करते हैं और रूपये पुलिस तक पहुंचाते हैं, इसलिए इस मार्ग पर डग्गामार वाहन दौड़ रहे हैं, जो मानक से कई गुना अधिक सवारियां भर कर उल्टी-सीधी दौड़ाते हैं। डग्गामार वाहनों पर शिकंजा कसने की दूसरी प्रमुख जिम्मेदारी उप संभागीय परिवहन कार्यालय की है, लेकिन एआरटीओ के पास भी निश्चित पैसा हर महीने पहुँचता रहता है, जिससे वो भी नज़र अंदाज़ करता है। एसडीएम और डीएम पुलिस के क्षेत्र का मामला होने के कारण अनदेखी करते रहते हैं, जबकि उनकी भी उतनी ही जिम्मेदारी है। मुश्ताक की टाँगे कटने में अज्ञात डग्गामार वाहन के साथ पुलिस, एआरटीओ, धन उगाहने वाले दबंग और डीएम भी बराबर के दोषी हैं।

अब बात करते हैं मुश्ताक के मरने की, तो उसकी मौत खून के माफियाओं के चलते हुई है, क्योंकि खुद को स्वयं सेवी के रूप में प्रचारित करने वाले रक्तदान शिविर आयोजित करते हैं और खून बदायूं के ब्लड बैंक को देने की जगह बरेली के एक खून माफिया के बैंक को दे देते हैं। दानदाताओं को पता ही नहीं होता कि उनका खून कहाँ जमा होगा या इस खून का क्या होगा?, वह सिर्फ मानव सेवा की प्रेरणा में खून देने चले आते हैं। बदायूं के माफियाओं ने दान दाताओं का खून बदायूं के ही ब्लड बैंक में जमा कराया होता, तो मुश्ताक की जान बच सकती थी, इसलिए यह खून माफिया भी उतने ही दोषी हैं।

खैर, जो व्यवस्था चल रही है, उसे बदलना आसान नहीं है, लेकिन कभी किसी शकिशाली अफसर को इन सब लोगों की कमी का अहसास हो गया और इन सब पर हादसों की जिम्मेदारी डाल दी, तो हादसों में नब्बे प्रतिशत की कमी आ जायेगी।

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