दादा के सिर बंधा जीत का सेहरा

दादा के सिर बंधा जीत का सेहरा

सुबह से ही शुरू हुई उल्टी गिनती समाप्त हुई और प्रणब मुखर्जी ने रायसिना हिल्स तक की बाधा दौड़ पूरी कर ली। उन्हें कुल पड़े 748 में से 527 वोट मिले हैं। उनके मुक़ाबले में उतरे पीए संगमा को 296 वोट मिले और 15 वोटों को अमान्य करार दिया गया। शुरू से ही लगभग तय था की प्रणव राष्ट्रपति बनेंगे पर फिर भी उनका यह सफर रोमांच से भरा रहा। कभी ममता ने उनकी राह में बाधाएं पैदा कीं तो कभी मुलायम  हाँ-न के झूले में झूलते रहे और दादा की साँसे ऊपर-नीचे होती रहीं। इस चुनाव से पहले का कोई राष्ट्रपति चुनाव इतनी अनिश्चितता लिए नहीं रहा। यही कारण था कि प्रणव पहले उम्मीदवार थे जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्रियों और सांसदों को फोन किया और अपने लिए समर्थन मांगा। आखिर उनकी मेहनत रंग लायी और जीत का ताज उनके सिर की शोभा बन गया। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी प्रणव के सामने चुनौतियों का अंबार है। उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की कार्यशैली से उनकी तुलना बार-बार की जाएगी। डॉ राजेंद्र प्रसाद जहां अपनी सादगी के लिए जाने जाते थे वहीं डॉ राधाकृष्णन शिक्षा में सुधारों से। डॉ कलाम देश को लेकर अपने विज़न और अति अल्प खर्चों के लिए लोकप्रिय हुए तो प्रतिभा पाटील सबसे खर्चीली राष्ट्रपति होने के नाते। प्रणब पर वित्त मंत्री रहते हुए ही अन्ना पार्टी द्वारा भ्रष्टाचार के आरोप पहले ही लग चुके हैं। अब देश की नज़रें दादा पर होंगी कि वे अपनी छवि किस प्रकार सुधारते हैं।

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