जन्मशती वर्ष पर विशेष- सादत हसन मंटो

जन्मशती वर्ष पर विशेष- सादत हसन मंटो
सादत हसन मंटो

11 मई, 1912 को जन्मे सादत हसन मंटो महज़ 42 वर्ष की छोटी सी ज़िंदगी काट कर 18 जनवरी, 1955 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनकी ज़िंदगी सालों के पैमाने पर भले ही छोटी रही हो पर असल में ‘लार्जर देन लाइफ’ थी। उन्होंने उर्दू लेखन को जो ऊंचाई दी उसे आज भी छू पाना असंभव है। वे बू, खोल दो, ठंडा गोश्त और टोबा टेकसिंह जैसी प्रसिद्ध कहानियों के रचनाकार के तौर पर जाने जाते हैं। कहानीकार होने के साथ-साथ वे फिल्म और रेडिया पटकथा लेखक और पत्रकार भी थे। अपने छोटे से जीवनकाल में उन्होंने बाइस लघु कथा संग्रह, एक उपन्यास, रेडियो नाटक के पांच संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह और व्यक्तिगत रेखाचित्र के दो संग्रह प्रकाशित किए। मंटो पर अश्लीलता के आरोप लगते रहे हैं। अश्लीलता के आरोप की वजह से मंटो को छह बार अदालत जाना पड़ा था, लेकिन एक भी बार आरोप साबित नहीं हो पाया। उन पर अश्लीलता का आरोप लगाने वाले शायद उन्हें समझ ही नहीं पाये। उनकी कहानी तमाम अश्लीलता के बावजूद व्यक्ति को चटखारे नहीं लेने देती। व्यक्ति सेक्स के नशे में झूमता हुआ नहीं उठता, बल्कि हर कहानी का अंत पाठक को इस हद तक झिंझोड़ जाता है कि उसे सामान्य होने में घंटों लगते हैं। पाठक को कभी समाज की गंदगी से घृणा होती है और कभी चीखकर रोने का मन करता है। मंटो सच के साथ छेड़छाड़ नहीं करते। वे उसे जस का तस परोसते हैं। बलात्कारी की आँखों की लाली और उसके मन में चल रहे घिनौने भावों का वे उसी रूप में शब्द चित्रण करते हैं। उनकी कहानी में अश्लीलता देखना कुछ वैसा ही है जैसे स्तनपान कराती माँ को देखकर नीयत खराब करना। संवेदनाओं को महसूस करने वाला, उन्हें जीने वाला ही ऐसे लिख सकता है, अन्य कोई नहीं। मंटो ने मानवीय समवेदनाओं को जीया है और उन्हें कागज़ पर उतारा है। उनकी चर्चित कहानी ‘खोल दो’ एक ऐसी लडक़ी की कहानी है जो बँटवारे के समय हुए फसाद में परिवार से बिछड़ गयी है। उसका पिता उसे लगातार ढूंढ रहा है। इस दौरान वह क्या-क्या झेलती है इसका इस कहानी में मार्मिक चित्रण है। कहानी के कुछ अंश – डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है? सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं…जी मैं…इसका बाप हूं। डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिडक़ी खोल दो। सकीना के मुर्दा जिस्म में जुंबिश हुई। बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी। बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है, मेरी बेटी जिंदा है . . . । डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया।

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