खुंखार आतंकी के पकड़े जाने पर खुश हों या दु:खी

खुंखार आतंकी के पकड़े जाने पर खुश हों या दु:खी

मुंबई में हुए 26/11 के हमले को हर कोई भूलना चाहता है, पर उसे भूलना शायद किसी के भी लिए संभव नहीं। शासन-प्रशासन की यह नाकामी देश की शर्मिंदगी ही नहीं बनी, बल्कि सैंकड़ों लोगों की बलि भी ले गयी। भारत के दिल मुंबई में घुसकर भारत पर हमला करने वालों से एटीएस के जवानों ने 36 घंटे मोर्चा लिया। इस युद्ध में 18 जवान शहीद हुए, जिसमें हेमंत करकरे जैसे जांबाज भी थे। कसाब नाम के आतंकवादी को जि़दा पकड़ा गया और उस पर हत्या, हत्या की साजि़श और देश के विरुद्ध युद्ध जैसे मामलों में मुक़द्दमा चला। आखिर में उसे फांसी की सज़ा हुई। विशेष अदालत के न्यायाधीश एम. एल. ताहिलयानी ने फैसला सुनाते हुए कहा, कि कसाब को फांसी की सजा नहीं दी जाती है तो आम आदमी का कानून से विश्वास उठ जाएगा। फांसी की सजा देने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इस व्यक्ति को कोई अधिकार नहीं है कि उसके साथ मानवीय व्यवहार किया जाए। यह उस व्यक्ति के शब्द हैं, जो न्याय की कुर्सी पर बैठा है, जिसका कोई दोस्त या दुश्मन नहीं, जो सबूतों के आधार पर निर्णय देता है। यह निर्णय केवल कसाब के लिए नहीं है। बाकी आतंकवादी, जिन्हें फांसी की सज़ा हुई, कहीं न कहीं कसाब जैसी ही दुर्दांतता का प्रतीक हैं। ऐसे में उस मानवीयता की क्या परिभाषा है, जिसके आधार पर इस प्रकार के अपराधियों की फांसी माफ कर दी जाती है? एक सैनिक का व्यक्तिगत रूप से कोई दुश्मन नहीं होता। देश का दुश्मन ही उसका दुश्मन होता है। उस दुश्मन को मारने के लिए वह अपनी जान तक की परवाह नहीं करता। शहादत की लंबी सूची इसका प्रमाण है। देश के दुश्मन के प्रति ऐसे ही भाव राष्ट्राध्यक्ष के भी होने चाहिए। आखिर सैनिक राष्ट्र के लिए ही तो लड़ता है और जब राष्ट्र के संरक्षक में ही देश के दुश्मन के प्रति रोष नहीं तो सैनिक किसके लिए लड़े और क्यों लड़े? 2००8 में पकड़ा गया कसाब आज तक जि़ंदगी के मज़े ले रहा है। आज पकड़ा गया अबू जिंदाल कब तक हमारी मेहमान नवाज़ी के मज़े लेगा, कह नहीं सकते। हम बहुत दयालु जो हैं। काश! इस दयालुता का कुछ अंश उन्हें भी मिलता, जिन्होने देश रक्षा में अपनी जान की बाज़ी लगा दी, जिनकी विधवायें अपने पति के हत्यारों को घृणित तुष्टीकरण के चलते आराम की जि़ंदगी जीते देख रही हैं, जिनके बच्चे बिना किसी गलती के अनाथों का सा जीवन जी रहे हैं। हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, सालस्कर आदि के साथ शहीद हुए 18 जवानों के लिए हर देश वासी की आँख नम थी, लेकिन उनके हत्यारों के साथ मेहमान जैसा सलूक होने पर हर आँख लाल है। उनमें एक ही सवाल है कि वर्ग विशेष को संतुष्ट करने की इस घटिया राजनीति के चलते आखिर कब तक शहादत का मखौल उड़ाया जाता रहेगा?

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