आरोपों पर भारी पड़ते हैं जनप्रिय राजा भैया

आरोपों पर भारी पड़ते हैं जनप्रिय राजा भैया

– आपराधिक मुकदमों के बावजूद बेहद लोकप्रिय हैं राजा भैया

– विधायक और मंत्री रहने के बाद भी नहीं हैं किसी दल के सदस्य

रघुराज प्रताप सिंह "राजा भैया"
रघुराज प्रताप सिंह “राजा भैया”

रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया और विवाद एक-दूसरे के पर्याय बनते जा रहे हैं। प्रतापगढ़ जनपद में कोई बड़ी घटना घटित हो जाए, तो विरोधी सीधे राजा भैया को ही निशाना बनाना शुरू कर देते हैं। प्रतापगढ़ जिले के गाँव बलीपुर में ग्रामीणों के साथ हुए संघर्ष में पुलिस उपाधीक्षक जिया उल हक की हत्या के मामले में राजा भैया एक बार फिर विवादों में हैं। उन पर सीओ की हत्या का षड्यंत्र रचने का आरोप है, जिससे मुख्यमंत्री तक परेशानी में पड़ गये हैं। हालांकि मुकदमा दर्ज हो गया है, राजा भैया ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है और उनका इस्तीफा मंजूर भी हो गया है, फिर भी मामला अभी शांत नहीं है।

सीओ की हत्या के बाद एक बार फिर सुर्ख़ियों में आये रघुराज प्रताप सिंह “राजा भैया“ जिला प्रतापगढ़ के तहसील कुंडा, थाना हथिगवां क्षेत्र में पड़ने वाले बेंती के मूल निवासी उदय प्रताप सिंह के बेटे हैं। 1969 में जन्मे राजा भैया लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। कुंडा विधान सभा क्षेत्र से विधायक चुने जाते रहे हैं। वर्ष 1993 में पहली बार चुने गये थे, लेकिन वह किसी राजनैतिक दल के सदस्य नहीं हैं। 1993 में निर्दल प्रत्याशी के रूप में ही विजयी हुए, इसके बाद 1996 और वर्ष 2000 में भी निर्दल ही लड़े, पर भाजपा ने समर्थन दे दिया। 2007 और 2012 के चुनाव में निर्दल राजा भैया को सपा ने समर्थन दिया। राजा भैया वर्ष 1996 में पहली बार कल्याण सिंह की सरकार में मंत्री बने, इसके बाद वर्ष 1999 में रामप्रकाश गुप्ता की सरकार में भी मंत्री रहे। वर्ष 2000 में राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने, तो उनकी सरकार में भी मंत्री रहे और वर्ष 2003 में मुलायम सिंह यादव के हाथों में सत्ता आई, तो राजा भैया को उन्होंने भी मंत्री पद दिया। वर्ष 2012 में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी सरकार में भी राजा भैया विरोध के बावजूद मंत्री बनाये गये।

राजा भैया की राजनैतिक रंजिश का दुष्परिणाम कहा जाए या उनकी दबंगई। जो भी हो, पर उन पर तीन दर्जन से अधिक आपराधिक मुकदमे हैं, जिनमें 8 मुकदमे न्यायालय के संज्ञान में है। मायावती सरकार में राजा भैया पर पोटा भी लगा, तब भी वह सुर्ख़ियों में रहे थे, जिसे सपा सरकार आने पर हटा दिया गया था। उन पर वर्ष 2010 में निकाय चुनाव के दौरान एक नेता की हत्या के प्रयास का मुकदमा लगा, जिसमें राजा भैया सहित 13 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने राजा के विरुद्ध वर्ष 2002 में अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया। इसके अलावा भी राजा भैया के विरुद्ध कई अन्य मामले भी हैं, जिनको लेकर वह समय-समय पर सुर्ख़ियों में छाये रहे हैं, इस सबके बावजूद वह अपने निर्वाचन क्षेत्र में दलों से ऊपर हैं। आम आदमी उन्हें प्रेम करता हैं, तभी वह रिकॉर्ड मतों से विजयी होते रहे हैं, जिसे लोकतंत्र में नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता, इसीलिए वह आरोपों पर हमेशा भारी पड़ते हैं। 

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