अखिलेश पर नहीं चढ़ा सत्ता का नशा

अखिलेश पर नहीं चढ़ा सत्ता का नशा

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने सौ दिन पूरे होने पर अखिलेश सरकार को पिछले दिनों सौ में सौ नंबर दिये, तो विरोधियों ने जमकर कटाक्ष किये, लेकिन विरोधियों के कटाक्ष पर जनता ने ध्यान नहीं दिया, क्योंकि जनता समझती है कि सीमित संसाधनों के द्वारा प्रदेश को पटरी पर लाने की बड़ी चुनौती अखिलेश यादव के सामने है, वह इस दिशा में काम करते भी दिख रहे हैं। फिलहाल उत्तर प्रदेश में वसूली दिवस के रूप में मनाये जाने वाले मुख्यमंत्री के जन्मदिन को सादगी पूर्ण वातावरण में मना कर उन्होंने एक और मिसाल कायम की है और सिद्ध कर दिया है कि उन पर अभी तक सत्ता का नशा सवार नहीं हुआ है। पढिय़े, गौतम संदेश की खास रिपोर्ट . . .

बधाई! उत्तर प्रदेश में बहुत दिनों के बाद ऐसा अवसर आया, जब मुख्यमंत्री के जन्मदिन को सरकारी समारोह की तरह नहीं मनाया गया। बसपा शासन में मुख्यमंत्री मायावती के जन्मदिन को लेकर नेताओं के साथ अफसरों के चेहरों पर दशहत के भाव स्पष्ट नजर आते थे। जन्मदिन वसूली का माध्यम भर बन गया था, ऐसे में इस बार लुटने से बचे अफसर बेहद खुश नजर आ रहे हैं। धन, सम्मान, यश और कीर्ति पाकर छोटे से छोटे आदमी का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच जाता है, पर अखिलेश यादव के व्यवहार को देख कर अभी तक नहीं लग रहा कि उन पर सत्ता का नशा सवार हुआ हो। व्यक्ति का कद कितना भी बढ़ जाये, पर पांव जमीन ही रहने चाहिए। अखिलेश यादव के हाव-भाव से स्पष्ट लग रहा है कि वह आज भी ग्लैमर से दूर हैं, इसके लिए वह बधाई के पात्र कहे जा सकते हैं। समाजवादी पार्टी के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का एक जुलाई को जन्मदिन था, लेकिन जन्मदिन की धूम कहीं दिखाई नहीं दी। अखिलेश ने सादगी पूर्ण वातावरण में आम दिनों की तरह ही काम करते हुए अपना जन्मदिन मनाया। उन्होंने आवास पर जुटे हमउम्र साथियों के साथ बातें कीं और बुजुर्गों से आर्शीवाद प्राप्त किया। हालांकि उन्हें लोगों ने जन्मदिन की बधाईयां दीं, पर तोहफा रहित बधाईयां मुस्करा कर स्वीकार करते हुए सामान्य दिनों की तरह ही वह काम निपटाते रहे। उधर उनके जन्मदिन को लेकर प्रदेश भर में कार्यकर्ता उत्साहित नजर आये, लेकिन सभी जगह सादगी पूर्ण अंदाज में ही जन्मदिन मनाया गया। कहीं पौधारोपण किया गया, तो कहीं मिष्ठान वितरण कर समाज सेवा का संकल्प लिया गया। खैर, जन्मदिन मनाने या न मनाने से आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता। आम आदमी भ्रष्टाचार और भयमुक्त वातावरण चाहता है। वह इस दिशा में काम करते दिख भी रहे हैं, लेकिन प्रदेश में भ्रष्ट बाबू पूरी तरह हावी हो चुके हैं, जो अफसरों को भी मलाई खानी देर-सवेर सिखा ही देते हैं, इसी तरह फिलहाल आपराधिक वारदातें भी नहीं रुक पा रही हैं, जिससे उबर पाना उनके लिए आसान काम नहीं है। प्रदेश भर में अभियान चला कर दागी बाबुओं और अफसरों को किनारे करना होगा, गुंडो और माफियाओं को सिर्फ कानून की नजर से देखने की ही आदत डालनी होगी, तभी आम आदमी को सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ मिल सकेगा और तभी भयमुक्त वातावरण कायम हो सकेगा। सरकार की साफ-सुधरी छवि बनाने की दिशा में वह काम करते दिख रहे हैं। उन्होंने मंत्रियों से रिश्तेदारों तक की संपत्ति का ब्योरा मांग कर वाकई सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने मंत्रियों को व्यवहारिक स्तर पर गाइड लाइन देकर आम आदमी के हित में ही काम किया है, क्योंकि लोकतंत्र में शासक जनसेवक की तरह ही दिखना चाहिए, वरना जनता में हीन भावना आ ही जाती है। इसी तरह तंबाकूयुक्त पान मसाला (गुटका) एवं सिगरेट-सिगार पर रविवार से पचास फीसदी की दर से वाणिज्य कर लगाने का निर्णय भी सही कहा जा रहा है। उनके इस निर्णय का साफ संकेत है कि बुरी आदतें छोड़ दो, वरना सरकार का ही आर्थिक सहयोग करो। विकास निधि से विधायकों को बीस लाख तक की गाड़ी खरीदने का अधिकार देने का निर्णय सही था, पर पहले ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिये थी कि बाकी विकास निधि का आंशिक तौर पर भी दुरुपयोग न हो पाये, क्योंकि पिछले पांच वर्षों में विधायक निधि का उत्तर प्रदेश में खुल कर बंदरबांट हुआ है और यह नहीं रुका, तो उन भ्रष्ट विधायकों के लिए बीस लाख कानूनी तौर पर हजम करने का ही अधिकार सिद्ध होता। उन्हें अभी और कई कड़े निर्णय लेने होंगे, लेकिन इस सबसे पहले अभियान चला कर प्रदेश की कानून व्यवस्था सही करनी होगी। पिछले विधान सभा चुनाव में जनता ने उनके भयमुक्त वातावरण देने के वादे पर विश्वास कर के ही प्रचंड बहुमत दिया था, इसलिए अखिलेश यादव को इस दिशा में गंभीरता से कार्य करना ही होगा, वरना जनता का दिल टूट सकता है।

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