केदार बाबा, यह क्या किया?

किरन कांत
किरन कांत

सुना है तुम सब कुछ सुनते हो बाबा, तो फिर उस दिन क्या हुआ तुमको … केदार बाबा तुमको पता है, माँ बहुत खुश थी और पापा भी, और हाँ, पड़ोस के लोगों ने भी हमारे साथ चलने की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन उनकी लड़की का इंटरव्यू कॉल आया, तो उनको रुकना पड़ा। उनके पैसे लाया था प्रसाद चढ़ाने के लिए मैं … कितना अच्छा था न वो सफर, जब हम ऋषिकेश पहुंचे थे, मैं पहाड़ों पर पहली बार आया था … सब कुछ वैसा ही था, जो बहुत साल पहले किताबों में पढ़ा था, मेरे साथ दौड़ते वो सीढ़ी नुमा खेत, ऊँची-ऊँची पहाड़ियां और धीमी-धीमी बारिश के साथ आती ठंडी हवा के खूब मजे कर रहा था, लेकिन मम्मी और पापा को तो बस, हर हर महादेव के जयकारे सूझ रहे थे … बीच में देवप्रयाग में हमारी बस जब रुकी थी, तो बारिश तेज़ हो चली थी, लेकिन आगे-आगे फिर मौसम अच्छा सा था … गुप्तकाशी की वो रात में जिंदगी भर नहीं भूल सकता, हमारे होटल के कमरे से मानो किसी ने दूर तक सोना बिखेर दिया हो, माँ और पापा पहले एक बार तब आये थे, जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था, उनके लिए तो सब बेकार था … उन्हें तो जल्दी थी बस, केदारनाथ के दर्शन की … खैर, मुझे ये सब नज़ारे इतने भाये कि मैं रात को 2 बजे तक जाग-जाग कर बार-बार अपने दोस्तों को फ़ोन कर के बता रहा था कि यहाँ का कैसा नजारा है … वो दोस्त, जो मेरे साथ आने वाले थे और किसी कारण नहीं आ पाये … सुबह-सुबह माँ ने उठा दिया, गाड़ी तैयार थी … शायद, गौरी कुण्ड जगह तक हमें और गाड़ी पर जाना था, उसके बाद पैदल … कोई सोच भी नहीं सकता था कि मैं कितना खुश था, यहाँ इतना सब कुछ है कि दोस्तों को कई दिनों तक बातें बताऊंगा, हम गौरी कुण्ड पहुंचे ही थे कि कुछ लोग नीचे उतर रहे थे, जोश के साथ हमने भी चढ़ाई शुरू कर दी, बहुत अच्छा लग रहा था, माँ और पिता दोनों बहुत खुश थे, कुछ देर बाद मुझे बहुत थकावट होने लगी, तो माँ बार-बार जयकार के साथ मुझे आगे चलने के लिए बोलती, माँ और पिता जी बहुत थक गए थे, लेकिन फिर भी वो पैदल चल रहे थे, करीब 3 घंटे चलने के बाद हमने एक जगह थोड़ा रुक कर विश्राम किया और फिर आगे बढ़े, तो रामबाड़ा आ गया, यहाँ सब कितना अलग है न माँ, कोई गाड़ी नहीं चलती, कोई पुलिस नहीं, कुछ नहीं, सिर्फ भक्ति के साथ उतरते और चढ़ते लोग हैं … माँ को कुछ खाना था, उनको शुगर था न, पापा ही फुल एनर्जी के साथ आगे बढ़ रहे थे और धीरे-धीरे हम शाम को केदारनाथ भी पहुंच गए, मैं हैरान था कि इतने ऊपर लोगों ने इतने बड़े-बड़े घरों और होटल को बसाया कैसे होगा, नीचे बहती नदी और चारों तरफ मुझे घेरे बादल … मानो, ये बोल रहे हों कि बस, यहीं रुक जाओ, पता नहीं था कि इतनी ठण्ड होगी, वो शाम की आरती और होटल में रुकना और बार-बार घंटों की आवाज मेरे कानो में गूंज रही थी, होटल के कमरे में बार-बार माँ का चाय वाले को बुलाना, मुझे जनवरी की याद दिलाने लगा, यहाँ मौसम बिल्कुल अलग था … माँ से मैंने साफ बोल दिया था, ऐसे में मुझे नाहने के लिए, तो बिल्कुल मत बोलना, ठण्ड में भला नाहता भी कौन … मैं माँ के अंदर में वो ही अजीब सी ख़ुशी देख रहा था,  जब मैं 12th में पास हुआ था, उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था … यहाँ सब जल्दी सो जाते हैं, मैं भी जल्दी सो गया, सुबह उठ कर जल्दी दर्शन कर निकलना भी तो था … हमने सुबह दर्शन किये थे, लेकिन फिर माँ की जिद थी कि एक और बार जाते हुए दर्शन करेंगे, हमने दुबारा 1 बजे  दर्शन किये, सुबह तो दर्शन से पहले माँ ने कुछ ना खाने की मानो कसम सी खायी थी … मैं सोच रहा था कि बाबा केदार माँ तुमको मुझ से ज्यादा प्रेम करती है, तभी तो वो होटल से मंदिर तक इस सर्दी में भी पैदल आई थी, जबकि एक बार चप्पल न लाने तक माँ ने पापा से रसोई में न जाने की कसम खा ली थी …

हम निकल गए थे कि अचानक कुछ दूरी पर बारिश बहुत तेज़ होने लगी, फिर भी हमें अच्छा सा लग रहा था, लेकिन कुछ देर बाद बादल ज्यादा तेज़ गरजने लगे, मुझे घर की याद आने लगी कि जब घर पर बादल गरजते थे, तो माँ फ़ोन कर के मेरा हाल पूछती थी और जल्दी घर आने को बोलती थी … बारिश और आसमान को क्या हुआ, अचानक बहुत तेज़ बारिश हो गयी और पैरो में तेज पानी पहने लगा, जिसके बाद लोगों ने ये कह कर हम को पहाड़ पर चढ़ने को कहा कि बारिश का पानी तेज़ आ रहा है, माँ मेरा हाथ पकड़े एक ऊँचे से पत्थर पर आ कर बैठ गयी, जहां पानी बिलकुल नहीं आ रहा था, सब जय बाबा केदार के जयकारे लगा रहे थे, माँ कितनी खुश थी न कि उनको दर्शन हो गए, रही बारिश की बात, तो पहाड़ो पर ये आम बात है, ऐसा पापा बार-बार बोल रहे थे कि अचानक पानी बहुत तेज़ आ गया, मेरे सामने कुछ कुर्सी और जरुरी सामान बहता आ रहा था कि अचानक पिता इस भीड़ में कहीं गुम से हो गए, माँ उनको देख नहीं पाई कि अचानक देखा कि वो किसी को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, जो बहता हुआ आ रहा था, उनका चश्मा भी तो गिर गया था, जिसके बिना उनको कुछ दिखाई भी नहीं देता, माँ परेशान होने लगी और उस पत्थर से नीचे उतर गयी, मैंने जब दोनों को देखा, तो मुझसे भी नहीं रहा गया, चारों तरफ से सिर्फ जोर-जोर से आवाजें आ रही थीं, कुछ देर पहले तक मंदिर की घंटियों से जो पहाड़ गूंज रहे थे, वो वातावरण भयावह चीख पुकार में बदल गया, माँ ने पिता का हाथ तो पकड़ा, लेकिन वो आगे निकल गए, जब तक मैं उन तक पहुंच पाता, तब तक वो मेरी आँखों से ओझल हो चुके थे, माँ तुम कहा हो, पापा तुम किधर हो, मेरी आवाज शायद, उनके कानों तक नहीं पहुंच पा रही थी, चारों तरह पानी की ही डरावनी आवाजें थीं, … देखते ही देखते कई लोग बहने लगे, माँ-पापा तुम कहां हो … मम्मी, मम्मी, मम्मी मैं यहाँ हूँ … और कुछ देर बाद बिल्कुल बदला-बदला सा मैं सोच रहा था कि इस पहाड़ी पर मैं कर क्या रहा हूँ, कुछ देर बाद सिर्फ पानी की आवाज थी, मेरे पास में कुछ लोग और भी थे, मैं रोता रहा … सोचा, शायद माँ आगे मिल जाये पानी कम होने के बाद, लेकिन दिन बीता, रात बीती, कोई आवाज नहीं, अगले दो दिन बाद कैसे काटे मैंने, यह मैं ही जानता हूँ … बाबा केदार थे न मेरे पास, फिर भी पता है कि माँ आगे मिलेगी, तो डांटेगी, पापा मुझे डांटेंगे कि तू पीछे क्यों रह गया था … अचानक अगले दिन कुछ लोग हेलीकॉप्टर से जाने लगे, मुझे भी ले जाने लगे, मैंने बहुत मना किया कि माँ को तो साथ आने दो, लोगों ने पूछा कि कहाँ है वो दोनों, मैंने कहा अभी नीचे उतरे हैं, तब लोग जल्दी से मुझे बैठाने लगे … हाँ, कुछ लोगों ने कहा तुम्हारे मम्मी-पापा इंतजार कर रहे है … माँ तुम्हारी याद आ रही है, पापा तुम मम्मी का ख्याल रख रहे होगे न … मैं बिल्कुल ठीक हूँ, मैंने कुछ खाया भी है, ऐसा ही कुछ सोचता रहा … अब चारों तरफ रोते लोग और अफरा-तफरी का माहौल था …

मुझे परेशान किये हुए थी माँ को लेकर जाने की जिद, तभी भीड़ जुट गई, कुछ लोगों ने कहा कि कुछ लोग मर गए हैं, पर मुझे तुम पर भरोसा था केदार बाबा कि आप सब ठीक कर लोगे, माँ से मिले पूरे 5 दिन हो गए … अब कुछ घर वाले मुझे ये कह कर घर ले आये कि माँ घर पहुंच गयी है और पापा भी … माँ अक्सर तुम्हारी कहानी सुनाती थी, धार्मिक किताबें खुद पढ़ती थी, मुझे उसका मतलब बताती थी, घर में सब कुछ अलग था, सिर्फ मेरा कमरा और कुछ मेहमान थे, धीरे-धीरे 10 दिन बीत गए, कुछ नहीं हुआ, माँ तुम ठीक तो हो न, माँ को लेने मैं दुबारा जाता, लेकिन कई हजार लोग मारे गए है, अब तो वहां जाने भी नहीं दे रहे हैं … तुम देख रहे हो न केदार बाबा … मुझे तुम्हारे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता है मम्मी-पापा … घर तो लौट आया, लेकिन आस आज भी बरक़रार है कि माँ तुम आओगी … एक साल बाद भी तुम नहीं आये मम्मी-पापा … केदार बाबा बुला लिया न तुमने अपने पास मेरे मम्मी-पापा को … माँ तो कहती है कि जो तुम्हारा नाम लेता है, उसके सब संकट टल जाते हैं … आज मैं तुम्हारे दर्शन को नहीं, बल्कि मम्मी-पापा की तलाश में आया हूँ, तुम्हें क्या पता कि मैं कितना अकेला हो गया हूँ, वो घर मुझे खाने को दौड़ता है, मुझे आज भी कपड़े धोने नहीं आते, जो कपड़े पहनने हैं, वो भी नहीं मिलते, सब मम्मी ही करती थी, मेरा कॉलेज जाना भी बंद हो गया है … सब कुछ बदल गया है … मैं पहले जैसा नहीं रहा हूँ अब … मुझे यह भी नहीं पता कि मुझे अब करना क्या है?

झारखंड के रहने वाले बी.कॉम के एक छात्र ने किरन कांत को गुप्तकाशी में यह सब सुनाया, जो शब्दों में पिरो दिया गया है।

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