कानून का राज खत्म, अजगर निगल रहा है प्राकृतिक संपदा

कानून का राज खत्म, अजगर निगल रहा है प्राकृतिक संपदा
कानून का राज खत्म, अजगर निगल रहा है प्राकृतिक संपदा

समाजवादी पार्टी के नेता विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे करते हैं। सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को लेकर गदगद नजर आते हैं, लेकिन दूसरा पक्ष भी पूरी सच और भयावह है, जिसकी वे चर्चा सुनना तक पसंद नहीं करते। दहशत में जनता मौन है, वहीं मलाई में बराबर की हिस्सेदार होने के कारण मीडिया मुददे दबाये हुए है, लेकिन दुष्परिणाम चुनाव परिणामों के रूप में सामने अवश्य आयेगा।

बदायूं जिले की बात करें, तो यहाँ ऐतिहासिक प्राचीन तालाब चंदोखर भू-माफियाओं के पेट में समाता जा रहा है। कठेर क्षेत्र की प्राचीन और प्रमुख नदी सोत अस्तित्व की जंग लड़ने लायक भी नहीं बची है। सोत नदी के बारे में कहा जाता है कि एक बार मुस्लिम सैनिक युद्ध लड़ कर लौट रहे थे, तभी वे प्यास से व्याकुल हो उठे। प्यास के चलते उनकी अवस्था मृत्यु समान हो चली थी, तभी किसी तरह वे सोत नदी तक आ गये और फिर सभी ने प्यास बुझाई, उन सैनिकों ने इस नदी को यार-ए-वफादार नाम दिया, इसी नदी के तट पर हजरत सुल्तान उल आरफीन का विश्व प्रसिद्ध मजार है। सोत नदी सौ मीटर भी सीधी नहीं चलती थी, इसलिए इसका एक भौगोलिक नाम सांपू भी है, जिसे शहर का एक माननीय अजगर लगातार निगल रहा है, लेकिन प्रशासन व सपा सरकार भी मौन है। प्रशासनिक व खुफिया सूत्रों का कहना है कि एक माननीय अजगर ने अब तक कुल 128 स्थानों पर जमीन कब्जा ली है, इसमें आधी सरकारी है, तो आधी गरीबों की है।

जमीन के कब्जों के अलावा भी शहर की हालत दयनीय है। उत्तर प्रदेश में लॉटरी बंद है, लेकिन बदायूं में खुलेआम कंप्यूटराइज्ड काउंटर खुले हुए हैं, जिनकी जानकारी पुलिस व प्रशासन के बड़े अफसरों को भी है, लेकिन सब के सब मौन हैं। केरोसिन की बात करें, तो तेल माफिया जिले भर के राशन डीलरों को तीन माह में दो बार तेल देता है। एक महीने का स्वयं खाता है, जो उसके पंपों पर डीजल में मिला कर बेच दिया जाता है।

पुलिस बंधुआ मजदूर बनी हुई है। थाने में कौन एसओ रहेगा?, इसका निर्णय एसएसपी नहीं, बल्कि माननीय करते हैं। किसे जेल भेजा जायेगा?, इसका निर्णय एसओ नहीं, बल्कि माननीय करते हैं। सरकार कह रही है कि गाय नहीं कटेगी, पर माननीय कहते हैं कि कटेगी, तो सरकार का आदेश रददी की टोकरी में डाल दिया जाता है।

शासन द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का हाल यह है कि माननीय की सूची में जिसका नाम है, वही पात्र है और जिससे माननीय खफा हैं, वह पात्र होते हुए भी अपात्र है। कुल मिला कर पूरे सिस्टम पर हाल-फिलहाल माननीय हावी हैं, इसीलिए हाहाकार मचा हुआ है, जिसका स्पष्ट दुष्परिणाम चुनाव के बाद नजर आयेगा। जनता इस कदर त्रस्त है कि चुनाव की तारीख घोषित होने का इंतजार बेसब्री से कर रही है। जनता माननीयों से बदला लेने को आतुर है।

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