महाशक्ति की जगह भारत को आधीन बना रहे हैं नरेंद्र मोदी

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा।

भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने सर्वप्रथम अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से गहरी मित्रता दर्शाने का प्रयास किया। बराक ओबामा ने भी नरेंद्र मोदी को निराश नहीं किया और जनवरी- 2014 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि बनने के लिए दौड़े चले आये। बराक ओबामा के भारत आने से नरेंद्र मोदी को विश्व और अधिक गंभीरता से लेने लगा, लेकिन अब खुलासा होने लगा है। बराक ओबामा की ओर से रिश्ता आत्मीय नहीं है, वे नरेंद्र मोदी की अति शीघ्र प्रसिद्ध होने की लालसा का गहन मंथन कर भारत आये और नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत अहसान कर गये, जिसे अब वसूल किया जा रहा है। वैश्विक पटल पर उभरते हुए आधीन करने की कूटनैतिक चाल के अंतर्गत अमेरिका एल.एस.ए. के द्वारा भारत को बांधना चाहता है, जिसमें वो लगातार कामयाबी की ओर बढ़ता नजर आ रहा है, क्योंकि भारत ने सहमति जता दी है।

लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (एल.एस.ए.) के बाद अमेरिका और भारत रक्षा क्षेत्र में सहयोग, तकनीक के आदान-प्रदान, एक-दूसरे के सैन्य सामान का साझा उपयोग कर सकेंगे। अमेरिकी रक्षा मंत्री एश्टर कार्टर और भारतीय रक्षामंत्री मनोहर पार्रिकर के बीच सैद्धांतिक सहमति बन गई है। अमेरिकी रक्षा मंत्री कार्टर ने कहा कि एल.एस.ए. से जुड़े सभी मुद्दों को सुलझा लिया गया है, हम सिद्धांतत: सहमत हैं और अब मसौदे को अंतिम रुप दिया जाना बाकी है, वहीं भारतीय रक्षा मंत्री पार्रिकर ने कहा है कि हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यहाँ सवाल यह उठता है कि असमंजस की स्थिति में कौन है और खुश कौन है?

अमेरिकी रक्षामंत्री एश्टन कार्टर और भारत के रक्षामंत्री मनोहर पार्रिकर।
अमेरिकी रक्षामंत्री एश्टन कार्टर और भारत के रक्षामंत्री मनोहर पार्रिकर।

जाहिर है कि समझौते की दिशा में आगे बढ़ने के बावजूद भारत असमंजस की स्थिति में है और जासूसी न करने की गारंटी देकर भी अमेरिका खुश है, क्योंकि ऐसा कोई तरीका है ही नहीं, जिससे यह पता लगाया जा सके कि अमेरिका जासूसी कर रहा है, या नहीं। न ही ऐसा कोई तरीका है कि अमेरिका को वही दिखे, जो समझौते में लिखा गया है, उसके अलावा न कुछ दिखे और न समझ आये। लिखित और व्यवहार में विशाल अंतर होता है। शर्तों के सहारे अमेरिका और भी दबंगई से भारत की खुफिया जानकारी जुटायेगा और अहसास होने के बावजूद भारत कुछ नहीं कर पायेगा, साथ ही भारत अमेरिका से व्यक्तिगत रूप से कभी कोई लाभ नहीं ले पायेगा, क्योंकि अमेरिका संतुलन बनाये रखने के सिद्धांत पर चलता है, इसी एक सिद्धांत के चलते वह महाशक्ति बना हुआ है। अमेरिका हमेशा पाकिस्तान को न सिर्फ ऑक्सीजन, बल्कि उतनी शक्ति भी देता रहेगा कि भारत कभी निडर न हो पाये। इसी तरह भारत के साधन और ज़मीन का दुरूपयोग कर वह अपने को महाशक्ति बनाये रखने के लिए चीन पर अंकुश लगायेगा और भारत को चीन पर कभी सवार नहीं होने देगा। भारत जल, थल और आकाश में चीन पर हावी हो भी गया, तो उसमें अमेरिका इतनी मजबूत बैसाखी की तरह होगा कि उसके हटते ही चीन के सामने भारत पुनः बौना ही नजर आयेगा। हर स्थिति में अमेरिका भारत पर हावी ही रहेगा, इसलिए अमेरिका की चौखट पर स्वाभिमान गिरवी रखने से बेहतर है कि चीन का मुकाबला किया जाये।

एल.एस.ए. से भारत को लाभ होता, तो अमेरिका पिछले दस वर्षों से करार करने के प्रयास क्यों कर रहा है? अमेरिका भारत का हित क्यों चाहता है? करार कर के वह भारत को शक्तिशाली क्यों बनाना चाहता है? एल.एस.ए. यदि हर तरह से भारत के हित में है, तो भारत अब तक संकोच क्यों करता रहा है? रक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिज्ञों की तो बात ही छोड़िये, सामान्य व्यक्ति भी बता सकता है कि कि इस करार से सम्प्रभुता प्रभावित होगी और न चाहते हुए भी मित्र देश तक के विरुद्ध भारत को अमेरिका के सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनना पड़ेगा। हो सकता है कि भारत प्रारूप में शब्द और वाक्य बदलवा ले, लेकिन जब प्रारूप ही अमेरिका का है, तो अंततः लाभ में उसी को रहना है।

बी.पी. गौतम
बी.पी. गौतम

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मित्रता का दंभ भरने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतना भी दबाव नहीं बना पाये कि अमेरिका पाकिस्तान को लड़ाकू एफ- 16 विमान के साथ किसी भी तरह का सैन्य सामान न दे, ऐसे में यह विश्वास कैसे कर लिया जाये कि अमेरिका भारत को शक्तिशाली बनाने में मदद करेगा। यह वही अमेरिका है, जो भारत के मिसाइल कार्यक्रम पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराता रहा है, यह वही अमेरिका है, जो आतंकवाद के विरुद्ध आतंकवाद के जनक पाकिस्तान का सहयोग लेता है, इसीलिए अमेरिका का अपरोक्ष गुलाम बनने से भारत को बचना चाहिए। भारत के नागरिकों को आशा थी कि नरेंद्र मोदी इज़रायल जैसा कट्टर और सम्प्रभु भारत बनायेंगे, साथ ही अजीत डोभाल के माध्यम से मोसाद जैसी एजेंसी तैयार करेंगे, जिससे विश्व के किसी भी कोने में बैठा भारत का दुश्मन भयग्रस्त रहेगा, लेकिन सम्प्रभु राष्ट्र भारत गणराज्य का भविष्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका की चौखट पर बंधक बनाने जा रहे हैं। स्वयं को प्रचंड राष्ट्रवादी कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत के भविष्य की अंश मात्र भी चिंता है, तो उन्हें एल.एस.ए. से पूरी तरह बचना चाहिए।

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