कानून के प्रति विश्वास घटने से कमजोर होता है देश

पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू
पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू

न्यायालयों की अपनी एक गरिमा है, इसके अलावा न्यायालयों के आदेशों के विरुद्ध अपील होती है। न्यायालयों के आदेशों की आलोचना सार्वजनिक तौर पर नहीं की जा सकती, लेकिन न्यायालयों से संबंधित हर प्रकरण गरिमा और अवमानना से ही जोड़ दिया गया है, इसलिए न्यायालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रकरण पर बोलने व लिखने से हर कोई बचता रहता है, ऐसे में उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू का खुलासा बेहद अहम कहा जा सकता है। खुलासा सनसनीखेज नहीं है और न ही उसमें कुछ नया है, क्योंकि अधिकाँश लोगों को पता ही है कि न्यायालयों के हालात क्या हैं? अधिकांश लोगों को यह भी पता है कि न्यायालयों में जजों की नियुक्त कैसे होती है? अधिकाँश लोग न्यायालयों की गिरती साख से दुखी हैं और अधिकांश लोग न्यायालयों को पूरी तरह पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त रखने के पक्ष में ही हैं, इसलिए पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू को इस मुददे पर व्यापक स्तर पर जनसमर्थन भी मिल रहा है। संसद के दोनों सदनों में हंगामा होने के राजनैतिक कारण हैं, जिससे आम जनता का कोई मतलब नहीं है। आम जनता चाहती है कि पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू ने मुददा उठा ही दिया है, तो नियुक्ति ही नहीं, बल्कि संपूर्ण न्यायायिक प्रक्रिया को लेकर भी ठोस निर्णय लेना ही चाहिए, वरना बहस के बाद इस मुददे पर चर्चा थम गई, तो फिर सालों कोई आवाज नहीं उठायेगा। क्या पता कि भविष्य में कोई मार्कण्डेय काटजू हो न हो, इसलिए सरकार की ओर से तत्काल ऐसा कदम उठना ही चाहिए, जिससे न्यायालयों के प्रति हर दिन आम जनता का विश्वास बढ़े।

पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष बने हैं, तब से किसी न किसी मुददे को लेकर वह चर्चा में बने ही रहते हैं। उन्होंने मीडिया को भी कठघरे में खड़ा किया है। और भी कई जरूरी व गैर जरूरी प्रकरणों में वे अपनी राय देते रहे हैं, जिससे उन पर भी आरोप लगते रहे हैं। उन्हें खास दलीय मानसिकता का पक्षधर घोषित करने का प्रयास किया जाता रहा है। उनके पिछले तमाम लेख व भाषण विवादित रहे हैं, लेकिन उनके ताज़ा लेख ने उन्हें लोकप्रिय बनाया है। आम जनता के बीच उनकी चर्चा ही नहीं हो रही, बल्कि उनका सम्मान भी बढ़ा है। उन्होंने जिस तरह पूरे प्रकरण को उठाया है, उसको लेकर वास्तव में वह बधाई के पात्र कहे जा सकते हैं।

पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने अपने ब्लॉग में लिखा था कि मद्रास हाईकोर्ट के भ्रष्ट जज अशोक कुमार को यूपीए सरकार के कार्यकाल में संरक्षण दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की कोलिजियम ने भ्रष्ट जज अशोक कुमार का कार्यकाल न बढ़ाने का फैसला कर लिया था। यूपीए सरकार को बचाने के लिए एक राजनीतिक दल के दबाव में फैसला बदला गया था। मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश के पद पर रहते हुए पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश जस्टिस आर.सी. लोहाटी से इस भ्रष्ट जज अशोक कुमार के संबंध में शिकायत की थी। पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की शिकायत पर जस्टिस लोहाटी ने आईबी से जांच कराई थी। आईबी की जांच रिपोर्ट में बताया गया कि संबंधित जज अशोक कुमार का आचरण ठीक नहीं है, उनकी कार्यशैली भ्रष्ट आचरण की है। आईबी की रिपोर्ट के बाद निर्णय लिया गया कि जज अशोक कुमार का कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया जायेगा।

पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने विस्तार से जानकारी दी है कि मुख्य न्यायाधीश वाई.के. सबरवाल के कार्यकाल में भी इस भ्रष्ट जज अशोक कुमार को संरक्षण मिला। मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन ने इस भ्रष्ट जज अशोक कुमार को स्थाई नियुक्ति ही दे दी। पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू द्वारा यह सब सार्वजनिक कर देने के बाद न्यायिक क्षेत्र में सन्नाटा नज़र आने लगा, वहीँ संसद में भूचाल आ गया।

उल्लेखनीय है कि अशोक कुमार को वर्ष 2003 में दो साल के लिए मद्रास हाईकोर्ट में अतिरिक्त जज के तौर पर नियुक्त किया गया था। पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू वर्ष 2004 में मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने, तो उनके संज्ञान में आया कि अशोक कुमार का न्यायिक कार्य संदिग्ध रहा है। जिला जज के रूप में भी उनकी छवि अच्छी नहीं रही है। एक राजनीतिक दल के खास रहे हैं। उस समय मार्कण्डेय काटजू ने पूरे प्रकरण को गंभीरता से लिया और सुप्रीम कोर्ट में उस समय चीफ जस्टिस रहे लोहाटी को अवगत करा दिया। आईबी से जांच हुई, जिसमें अशोक कुमार का चरित्र संदिग्ध पाया गया। कोलिजियम ने अप्रैल 2005 के बाद अशोक कुमार का कार्यकाल आगे न बढ़ाने की संस्तुति की, लेकिन यूपीए सरकार के खास घटक दल द्रमुक के दबाव में अशोक कुमार को नहीं हटाया गया। सरकार बनाये रखने के लिए न्यायालय की प्रतिष्ठा को तार-तार कर दिया गया।

हाईकोर्ट में अशोक कुमार की नियुक्ति के विरुद्ध 2007 में पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांतिभूषण ने एक जनहित याचिका भी दायर की थी, जिसको लेकर समूचा प्रकरण चर्चा में रहा था, लेकिन हुआ कुछ नहीं, क्योंकि विवादित जज जुलाई 2009 में सेवानिवृत्त हो गये और तीन महीने बाद ही उनका निधन हो गया।

अब पूर्व जस्टिस काटजू के खुलासे के बाद पूर्व कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने मीडिया के समक्ष स्वीकार कर लिया है कि 2005 में द्रमुक के सांसदों ने जस्टिस अशोक कुमार का कार्यकाल बढ़ाए जाने के लिए दबाव बनाया था। इन लोगों ने कहा था कि जस्टिस अशोक कुमार दलित हैं, इसलिए उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। उन्होंने कानून मंत्री की हैसीयत से तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस लोहाटी को पत्र लिखा था, लेकिन उन्होंने मनमोहन सरकार को बचाने का आरोप गलत बताया।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट कर चुके हैं कि मद्रास हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर ही 2007 में जस्टिस अशोक कुमार को स्थाई किया गया था और आईबी की रिपोर्ट उनके संज्ञान में नहीं थी।

विवाद के बाद केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद कह चुके हैं कि उनकी सरकार राष्ट्रीय न्यायिक आयोग गठित करने के लिए संकल्पवान है। उच्च स्तर पर न्यायपालिका में नियुक्तियों और पदोन्नतियों के प्रकरण में पारदर्शिता बरतने का प्रयास किया जायेगा, लेकिन इतने कहने भर से काम नहीं चलेगा, क्योंकि न्यायालय मौलिक अधिकारों का संरक्षक है। न्यायालय की कार्यप्रणाली हर हाल में स्वच्छ व पारदर्शी होनी ही चाहिए, क्योंकि जिस देश के लोगों का विश्वास जज और कानून से उठता जाता है, वह देश कमजोर होता जाता है।

बी.पी.गौतम
बी.पी.गौतम

पूर्व जस्टिस काटजू के लेख पर हुए बवाल के बाद सरकार ने एक-दो नियम और बना भी दिए, तो उससे कुछ सुधार नहीं होने वाला। मुंसिफ मजिस्ट्रेट के न्यायालय से सुधार की शुरुआत करनी होगी और सुप्रीम कोर्ट तक उतने ही कड़े नियम बनाने होंगे। न्यायालय में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर अब आम आदमी को उल्टे ताने मिलने लगे हैं। प्रशासनिक कार्यालयों में तैनात कर्मचारी आम आदमी के सामने रिश्वतखोरी की दलील देते हुए चेतावनी देने लगे हैं कि अदालत में कुछ नहीं कहते, वहां रिश्वत चुपचाप दे आते हो। धनाढ्य लोगों की जिला न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट तक में फाइल दबा दी जाती है। उच्च स्तरीय दबाव के चलते फैसले भी प्रभावित होते रहे हैं, ऐसे में न्यायालयों में स्वच्छता और पारदर्शिता की स्पष्ट नीति लागू करना बेहद आवश्यक हो गया है और कड़े नियम बनाने का सुअवसर पूर्व जस्टिस काटजू ने प्रदान कर दिया है, जिसका सरकार को तत्काल लाभ उठाना चाहिए।

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