देश को विकास की राह पर ले जा सकती है ब्याज रहित अर्थ व्यवस्था

गोष्ठी में विचार व्यक्त करते वक्ता।

बदायूं स्थित अल फरिया अस्पताल में सद्भावना मंच की ओर से “अर्थ व्यवस्था ब्याज रहित या ब्याज सहित” विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का शुभारंभ मोहम्मद मुज़क्किर ने पवित्र कुरान के पाठ से किया, इसके बाद सद्भावना मंच के संचालक सिराज अहमद ने मंच के उद्देश्यों के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि हमारा देश एक गुलदस्ते के समान है, जो सदियों से गंगा-जमुना तहजीब का प्रतीक रहा है, लेकिन कुछ समय से हमारे देश की संस्कृति को दूषित करने का कार्य किया जा रहा है, कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा हमारे देश की सद्भाभावना खत्म कर के अपने स्वार्थ को पूरा करने की कोशिश की जा रही है, इन्हीं असामाजिक तत्वों को खत्म करने के लिए सद्भावना मंच बनाया गया है।

मंच के अध्यक्ष एडवोकेट सुरेश चंद्र ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारा मुल्क एक विशाल जनसंख्या वाला मुल्क है और हमारे मुल्क की अर्थ व्यवस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से हैं, जहां तक ब्याज रहित अर्थ व्यवस्था का सवाल है, तो यह हमारे लिए बहुत लाभकारी होगी। गौरव श्याम रस्तोगी ने भी ब्याज रहित अर्थ व्यवस्था का समर्थन किया। गोष्ठी में मौजूद एडवोकेट सफीर उददीन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इस वक्त दुनिया के ज्यादातर मुल्कों में ब्याज रहित अर्थ व्यवस्था का चलन है। फरहत हुसैन ने कहा कि आज के दौर में इस्लामिक बैंकें सिर्फ इस्लामी मुल्कों में ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, अमेरिका में भी लोकप्रिय हो रहे हैं। दिलकश बदायूँनी ने कहा ब्याज रहित अर्थ व्यवस्था से कारोबार व अन्य योजनाओं के नुकसान की स्थिति में दिवालिया होने के खत रात कम रहते हैं, जबकि वाणिज्य व्यवस्था में ऐसा नहीं होता। परमेश्वरी लाल साहू ,कौशल गुप्ता ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

अंत में गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे मुख्य अतिथि डॉ. मसूद आलम हाशमी ने कहा कि हमारा देश इस वक्त आर्थिक मंदी झेल रहा है। अगर, इस मंदी से उभरना है, तो अपने मुल्क में ब्याज रहित अर्थ व्यवस्था लागू करनी होगी। श्री मसूद ने कहा कि ब्याज रहित अर्थ व्यवस्था की लोकप्रियता का अंदाजा इस से लगाया जा सकता है कि यह विश्व के विकसित मुल्कों में भी सफलता पूर्वक काम कर रही है। श्री मसूद ने कहा भारत की वर्तमान ब्याज आधारित पूंजीवाद व्यवस्था भारत को तबाही की ओर ले जा रही है, लिहाजा आर्थिक मंदी से निकलने के लिए कुरान शरीफ का अध्ययन आवश्यक है। श्री मसूद ने बताया कि आज विश्व के करीब 500 इस्लामी बैंकों द्वारा वार्षिक 1000 $1 का कारोबार होता है, यदि अपने देश में यह प्रणाली शुरू की जाती है, तो इससे पूंजी का कुछ हिस्सा इधर भी आ सकता है, जो अर्थ व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ समाज को शोषण से भी बचायेगा।

मंच के सचिव डॉ. इत्तेहाद आलम ने गोष्ठी में आये लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह की गोष्ठियां हमें लगातार करते रहना चाहिए, जिससे समाज में जागरूकता आये। संचालन मोहम्मद मुस्लिम अंसारी ने किया, इस अवसर पर सरफराज अब्बासी, रियाज अहमद, इम्तियाज अहमद, आबिद अब्बासी, अमित कुमार, अब्दुल कयूम खान, देवेंद्र शर्मा, डॉ. मोहम्मद यूसुफ, आलोक चौधरी, डॉ. सबीह खान,शरीयत हुसैन सहित अन्य तमाम लोगमौजूद रहे।

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