शासन को गुमराह कर डीपीआरओ बनाये गये हैं राजेश यादव

दबंग व विवादित अधिकारी राजेश यादव।
दबंग व विवादित अधिकारी राजेश यादव।

बदायूं जिले के बहुचर्चित, दबंग और विवादित अफसर राजेश यादव को पुनः डीपीआरओ का कार्यभार देने में एक बार फिर नियमों का उल्लंघन किया गया है। पूर्व की ही तरह दो विकास क्षेत्रों के खंड विकास अधिकारी का कार्यभार दे दिया गया है, साथ ही पुनः शासन से अनुमति लिए बिना ही राजेश यादव को डीपीआरओ का कार्यभार दिया गया है, जिससे सरकार की बड़ी फजीहत हो रही है। लोग यहाँ तक सवाल करने लगे हैं कि वो कौन सा कारण है, जिसके चलते नियमों की अनदेखी कर राजेश यादव को डीपीआरओ का कार्यभार दिया जा रहा है, साथ ही यह सब घपला कराने के पीछे कौन है?

उल्लेखनीय है कि विधान परिषद सदस्य के चुनाव में आरोप लगे, तो चुनाव आयोग के निर्देश पर प्रभारी डीपीआरओ राजेश यादव को लखनऊ स्थित ग्राम्य विकास विभाग के प्रमुख सचिव के कार्यालय से 2 मार्च 2016 को संबंद्ध कर दिया गया था, लेकिन उनका न निलंबन हुआ और न आरोपों की विभागीय जांच हुई, साथ ही आचार संहिता समाप्त होते ही उन्हें पुनः बदायूं जिले में तैनात कर दिया गया।

बता दें कि जिलाधिकारी ने जून 2014 में शासन से डीपीआरओ का दायित्व देने के संबंध में सुझाव माँगा था, जिस पर शासन ने 1 जुलाई 2014 को जिलाधिकारी को ही यह अधिकार दे दिया कि वे वरिष्ठता के आधार पर जिला स्तरीय अधिकारी को कार्यभार दे दें, क्योंकि डीपीआरओ की कमी के चलते फिलहाल तैनात कर पाना संभव नहीं है, इस पर जिलाधिकारी ने राजेश यादव को कार्यभार दे दिया, जबकि वे न जिला स्तरीय अधिकारी हैं और न ही वरिष्ठ, साथ ही सोनभद्र जिले में हुए घोटाले में संलिप्तता के चलते सीबीआई जाँच के दायरे में भी है।

जिलाधिकारी द्वारा किये गये आदेश की छायाप्रति।
जिलाधिकारी द्वारा किये गये आदेश की छायाप्रति।

चुनाव आयोग द्वारा हटाने के बावजूद जिलाधिकारी द्वारा पुनः राजेश यादव को ही कार्यभार दे दिया गया है, जिसमें पूर्व में शासन से लिए गये सुझाव का हवाला दिया है, साथ ही राजेश यादव को अनुभव के आधार पर वरीयता देने की बात कही गई है। जिलाधिकारी ने पूर्व में ही गलत कार्यभार दिया था और अब चुनाव आयोग की आपत्ति भी लग चुकी है, ऐसे में जिलाधिकारी को स्पष्ट रूप से शासन से पूछना चाहिए था कि राजेश यादव को कार्यभार दे सकते हैं, या नहीं, लेकिन राजेश यादव को डीपीआरओ की कुर्सी पर बैठाना था, सो शासन के सुझाव का दुरूपयोग किया जा रहा है, लेकिन इतना निश्चित है कि कभी उच्चस्तरीय जांच हुई, तो जिलाधिकारी भी जवाब नहीं दे पायेंगे।

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