माँ कुमाता नहीं होती, तो भ्रूण हत्या कैसे हो जाती है?

नाले से भ्रूण के शव को बाहर निकालने का प्रयास करता सब-इंस्पेक्टर।
नाले से भ्रूण के शव को बाहर निकालने का प्रयास करता सब-इंस्पेक्टर।

बदायूं में वन विभाग कार्यालय के सामने वाली सड़क पर सुबह से ही लोगों की भीड़ जमा थी। युवा, बुजुर्ग और महिलाओं सहित हर वर्ग के लोग मौजूद थे और किसी अज्ञात माँ को भला-बुरा कह रहे थे। लोग तरह-तरह की बातें करते हुए सामाजिक कुरीतियों की भी निंदा कर रहे थे।

“पूत कपूत सुने बहुतेरे, माँ न सुनी कुमाता”, जैसी कहावतें अब झूठी सिद्ध होने लगी हैं। जी हाँ, बुधवार को प्रकाश में आई घटना से तो यही स्पष्ट हो रहा है कि अब माँ के हृदय में भी परिवर्तन आ गया है। सिविल लाइन थाना क्षेत्र में वन विभाग कार्यालय की ओर जाने वाली सड़क पर न्यायालय परिसर के उत्तरी गेट के बराबर स्थित नाले में भ्रूण पड़ा था, जिस पर किसी की नज़र पड़ी, तो एक-एक कर लोग जमा होते चले गये।

नाले में पड़ा भ्रूण बड़ा ही हुष्ट-पुष्ट नज़र आ रहा था, जिसे देख कर कोई कह रहा था कि बिन ब्याही माँ की करतूत होगी, तो कोई कह रहा था कि किसी के तीसरी-चौथी या पांचवीं संतान के रूप में लड़की हुई होगी, तो मार कर फेंक दी होगी, कोई कह रहा था कि मृत बच्चा पैदा होने पर दफनाने की बजाये नाले में फेंक दिया होगा। हर कोई अपनी-अपनी राय दे रहा था और अज्ञात माँ को भी कोस रहा था। सूचना पर पहुंची सिविल लाइन थाना पुलिस ने भ्रूण के शव को निकाल कर दफनाने का इंतजाम करा दिया, तो सामाजिक कुरीतियों पर थोड़े देर पहले भाषण देने वाली भीड़ भी चली गई। सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है। किसी और नाले में बच्चियों के भ्रूण अब भी मिलते रहेंगे। क्या माँ और क्या बाप, बच्चियों के मामले में सोच आज भी पाषाण कालीन ही है, जिससे आगे बढ़े बिना सामाजिक उत्थान असंभव है।

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