तर्कहीन बातें कर रहे हैं प्रकाश करात

माकपा महासचिव प्रकाश करात

अब आम आदमी भी जान गया है कि राजनीति में ऊंट किसी भी करवट पर बैठ सकता है। ऊंट को दायें की जगह बायें या बायें की जगह दायें बैठाने पर जनता विरोध करे भी, तो ऊंट को विपरीत दिशा में बैठाने वाले के पास पर्याप्त तर्क होते हैं और वह उन तर्कों को जनता पर थोप भी देता है। आम आदमी की मंशा का ख्याल ही नहीं रखा जा रहा है, इसीलिए अधिकांश लोगों ने पूरे ऊंट पर ही ध्यान देना बंद कर दिया है। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनेता अपने-अपने ऊंटों को लेकर इधर-उधर भागते नजर आ रहे हैं, तो कई राजनेता यूपीए या एनडीए के अहाते में अपने ऊंट को बैठा चुके हैं। जनता कुछ नहीं कह रही है, फिर भी गलत अहाते में बैठाने पर खुद का ही मन खिन्न है, सो बेवजह तर्क भी दे रहे हैं। माकपा के महासचिव प्रकाश करात की बात की जाये, तो वह यूपीए के प्रत्याशी प्रणव मुखर्जी को समर्थन देने का ऐलान कर चुके हैं, साथ ही कांग्रेस की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए कह रहे हैं कि वह समर्थन कांग्रेस को नहीं, बल्कि प्रणव मुखर्जी को दे रहे हैं। यहां सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस व्यक्ति है या कोई खास व्यक्ति ही कांग्रेस है? सोनिया गांधी को ही कांग्रेस मान लिया जाये, तो प्रणव मुखर्जी पूरी कांग्रेस के साथ सोनिया गांधी की भी पसंद हैं, इसलिए प्रकाश करात का यह तर्क स्वत: ही खारिज हो जाता है। वह कांग्रेस की आर्थिक नीतियों की लगातार आलोचना कर रहे हैं। महंगाई और भ्रष्टाचार के लिए गलत आर्थिक नीतियों को प्रमुख कारण बता रहे हैं, लेकिन यह सब कहते हुए वह भूल रहे हैं, कि यूपीए सरकार में वित्त मंत्री के पद पर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी ही रहे हैं, इसलिए विफलता के लिए प्रमुख दोषी वही हैं, इस दृष्टि से भी प्रणव मुखर्जी को समर्थन देने की प्रकाश करात की बात में दम नजर नहीं आ रहा। माकपा महासचिव प्रकाश करात का यह भी कहना है कि एनडीए में पड़ी दरार, नरेन्द्र मोदी की आक्रामकता और सांप्रदायिक भाजपा के उम्मीदवार पीए संगमा को समर्थन नहीं दिया जा सकता, जबकि पीए संगमा एनडीए या भाजपा के उम्मीदवार ही नहीं है। भाजपा व अन्य सहयोगी दल पीए संगमा को समर्थन ही दे रहे हैं, ऐसे में निर्दलीय संगमा को वह भी समर्थन दे सकते थे। इसके अलावा भाजपा या एनडीए की अन्र्तकलह से उनका व्यक्गित या राजनैतिक तौर पर भी कोई लेना-देना नहीं होना चाहिये। असलियत में प्रणव मुखर्जी को समर्थन देने के प्रकाश करात के निर्णय और दलीलों में कौआ चालाकी की झलक दिखाई दे रही है। स्पष्ट नजर आ रहा है कि वह क्षेत्रवाद की गुलामी से ग्रस्त होकर प्रणव मुखर्जी को समर्थन देने को मजबूर हुए हैं। और आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक या किसी भी तरह के लग सकने वाले आरोपों से बचने के लिए बेतुके तर्क दे रहे हैं। राजनैतिक दृष्टि से माकपा की कांग्रेस से वैचारिक दूरी हमेशा से ही रही है, पर परमाणु करार के मुद्दे पर समर्थन वापस लेने के बाद से व्यक्तिगत खटास भी पैदा हो गई थी। समर्थन वापस लेते समय भी प्रकाश करात ही महासचिव थे, ऐसे में कांग्रेस के प्रत्याशी को समर्थन देने के लिए उनका कोई भी तर्क सही कैसे माना जा सकता है? राजनीति में निजी हितों को सर्वोपरि रखने का दौर चल रहा है, ऐसे में प्रकाश करात भी अपने हितों की रक्षा के लिए ही तर्क गढ़ते दिखाई दे रहे हैं। खैर, इसी तरह तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपने ऊंट को किसी के अहाते में बैठाने का निर्णय ले ही चुकी होंगी और शायद, प्रकाश करात की तरह ही वह भी फिलहाल तर्क गढऩे में व्यस्त होंगी।

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